October 15, 2026

News Prawah

UDYAM-MP-49-0001253

Thalassemia & Sickle Cell Awareness: जबलपुर के सरबजीत बने महादानी, सिकलसेल-थैलेसीमिया मरीजों के लिए बनाया रक्तदान का मिशन

किसी की जिंदगी बचाने के लिए उठाया गया एक छोटा-सा कदम कब पूरे जीवन का सबसे बड़ा मिशन बन जाए, इसका जीवंत उदाहरण जबलपुर के रांझी निवासी 57 वर्षीय सरबजीत सिंह नारंग हैं। सरबजीत अब तक 203 बार रक्तदान (Blood Donation) कर चुके हैं। उनका कहना है कि वे किसी वर्ल्ड रिकॉर्ड या सम्मान के लिए नहीं, बल्कि उन बेबस और जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए रक्तदान करते हैं, जिन्हें सही समय पर खून नहीं मिल पाता है। वर्ष 1990 में मात्र 21 साल की उम्र में अपने दोस्त की मां के इलाज के लिए पहली बार खून देने के बाद उन्होंने हर तीन महीने में रक्तदान करने का नियम बना लिया।

🩺 सिकलसेल और थैलेसीमिया मरीजों के लिए बने सहारा: ‘दिशा फाउंडेशन’ के जरिए जोड़ा सैकड़ों लोगों का कुनबा

रक्तदान के दौरान सरबजीत को सिकलसेल और थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारियों की जानकारी मिली, जहाँ मरीजों को नियमित रूप से खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। इन मरीजों की पीड़ा देखकर उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर ‘दिशा फाउंडेशन’ नाम का संगठन बनाया। इस मुहिम के तहत अकेले जबलपुर में ही 12 ऐसे लोग तैयार हुए हैं, जो 100 से अधिक बार रक्तदान कर चुके हैं। इसके अलावा सरबजीत का यह संकल्प अब पारिवारिक संस्कार बन चुका है; उनकी पत्नी 27 बार रक्तदान कर चुकी हैं और उनके बेटों ने भी 18 वर्ष के होते ही रक्तदान करके अपना जन्मदिन मनाया है।

💒 शादी की सालगिरह से लेकर विवाह समारोह तक में रक्तदान: युवाओं से की आगे आने की अपील

सरबजीत सिंह नारंग ने अपनी शादी की सालगिरह भी रक्तदान शिविर के रूप में मनाई। उनसे प्रेरित होकर जबलपुर में अब तक ऐसी 3 शादियाँ हो चुकी हैं, जहाँ मेहमानों के लिए रक्तदान काउंटर लगाए गए थे। हार्डवेयर की दुकान चलाने वाले और दिन में 18 घंटे काम करने वाले सरबजीत पूरी तरह स्वस्थ हैं। उनका कहना है कि नियमित रक्तदान करने से शरीर में ब्लड क्लॉटिंग, हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक का खतरा कम होता है। वे युवाओं से अपील करते हैं कि 18 साल की उम्र पूरी होते ही पात्र होने पर रक्तदान अवश्य करें।

Share to...