छिंदवाड़ा। कोई अपने सोनू-मोनू को रंग-बिरंगे कपड़े पहनाकर लाया था, तो किसी ने चिंटू और मिंटू को बेहद खास अंदाज में तैयार किया था। फिर सभी अपने चहेते बैलों को लेकर पोला ग्राउंड पहुंचे, क्योंकि मौका अपने बैलों को सबसे सुंदर दिखाने का था। बैलों के इस अनोखे फैंसी ड्रेस कॉम्पिटिशन में सैकड़ों बैल अलग-अलग विचित्र वेशभूषा में पहुंचे। प्रतियोगिता में सबसे सुंदर बैल का प्रथम पुरस्कार ‘महाकाल के नंदी’ रूप में सजे बैल ने जीता।
🎨 पोला पर्व के दौरान बैलों की सजावट प्रतियोगिता में उमड़ा उत्साह
छिंदवाड़ा के ऐतिहासिक पोला ग्राउंड में किसान अपने बैलों को अलग-अलग रूप में सजाकर लाए थे। मौका था पारंपरिक पोला पर्व का, जहां बैलों की सुंदर सजावट प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। किसानों ने अपने बैलों को आकर्षक वस्त्र पहनाए थे तो किसी ने उनके शरीर पर रंग-बिरंगे सुंदर चित्र बनाए थे। एक किसान अपने बैल को ‘महाकाल का नंदी’ बनाकर लाया था, जिसके ऊपर भगवान शिव के रूप में एक व्यक्ति भी विराजमान नजर आ रहा था।
🕉️ बरारीपुरा से निकली भव्य शोभायात्रा, शिव जी के गण बने आकर्षण का केंद्र
पोला पर्व के अवसर पर बरारीपुरा से एक भव्य शोभायात्रा निकाली गई। इसमें पारंपरिक ‘शैला नृत्य’ के साथ-साथ रैली के आगे भगवान शिव की बारात चल रही थी। इस बारात में भूत-प्रेत, बंदर, भालू और नंदी का रूप धरे कलाकार आकर्षण का केंद्र रहे। यह शोभायात्रा शहर के विभिन्न प्रमुख मार्गों से होती हुई पोला ग्राउंड पहुंची, जहां पहले से ही किसान अपने सुसज्जित बैलों के साथ मौजूद थे। इसके बाद आयोजित फैंसी ड्रेस कॉम्पिटिशन में ‘महाकाल के नंदी’ को सर्वश्रेष्ठ बैल घोषित कर सम्मानित किया गया।
पोला उत्सव समिति के आयोजक विजय पांडे ने बताया, “कई दशकों से पोला ग्राउंड पर पोला उत्सव मनाया जाता रहा है। कुछ वर्ष पूर्व प्रशासनिक अनदेखी के कारण यह परंपरा लुप्तप्राय होने लगी थी, लेकिन 16 साल पहले हमने पोला उत्सव समिति का गठन कर इसे पुनः व्यवस्थित रूप दिया। हम प्रतिवर्ष यहां बैलों की सजावट प्रतियोगिता कराते हैं और उत्कृष्ट सजावट वाले बैलों को पुरस्कृत करते हैं। इस वर्ष भी बड़ी संख्या में नागरिकों और किसानों ने सहभागिता की।”
🌾 बैलों के योगदान के प्रति आभार व्यक्त करने का पावन पर्व ‘पोला’
भाद्रपद (भादो) मास की अमावस्या को पोला पर्व मनाया जाता है। कृषक समुदाय का मानना है कि इस तिथि तक खेती के मुख्य कार्य संपन्न हो जाते हैं, जिसके बाद बैलों को विश्राम दिया जाता है। बैल किसानों के सबसे निष्ठावान और मेहनती साथी होते हैं। अपने इन सहयोगियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए इस दिन उनकी विशेष खातिरदारी की जाती है। पोला पर्व के बाद करीब एक महीने तक बैलों से खेतों में भारी काम नहीं लिया जाता ताकि वे पूरी तरह आराम कर सकें। इस दिन घरों में महिलाओं द्वारा बैलों के लिए विशेष स्वादिष्ट पकवान भी तैयार किए जाते हैं।

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