डॉ हीना तिवारी
कभी माँ, कभी बेटी, कभी बहु के रूप हैं निभाती, पर क्या ख़ुद के लिए ही छिपा पाती?
कभी सुबह, कभी शाम, कभी दिन रात कार्य करती है जाती, पर ख़ुद को है क्या यह समय दे पाती?
कभी शक्ति, कभी विश्वरूपा, अन्नपूर्णा और कभी अबला है कहलाती, पर क्या ख़ुद के लिए हैं कभी लड़ पाती?
कभी ससुराल, कभी मायका सबको है अपना बनाती, पर ख़ुद का घर भी है क्या बना पाती?
हर रिश्ते को अपना है बनाती, पर क्यों वह अपनी जगह है ढूंढती रह जाती?
कभी ज़िम्मेदारी, कभी अपनों की ख़ुशी, कभी कर्तव्य है निभाती, पर क्यों वह ख़ुद ही कहीं पीछे है रह जाती।
नारी एक रूप अनेक है निभाती, फिर भी जीवन में क्यों नहीं है वह सब कुछ पाती?
….कई सवाल है यह कविता पूछती, एक नारी कितने रुपों को है निभाती पर क्या सवालों का जवाब है खोज पाती?
Happy Women’s Day

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