आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू हुए शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की विधि-विधान से उपासना की जाती है। इस पूरे उत्सव के दौरान ‘कंजक पूजन’ (कन्या पूजन) का अत्यधिक धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, दो वर्ष से लेकर दस वर्ष तक की कन्याओं को मां दुर्गा का साक्षात स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है, क्योंकि उम्र के हर पड़ाव का अपना विशेष दैवीय महत्व होता है। इसके अलावा, कन्या पूजन के दौरान एक छोटे बालक को ‘लांगुरिया’ या ‘लांगूर’ के रूप में बैठाकर पूजा जाता है, जिन्हें मां दुर्गा के रक्षक भैरव बाबा का स्वरूप माना जाता है।
⏰ अष्टमी और नवमी पर कंजक पूजन का शुभ मुहूर्त: इस समय पूजा करना माना जाता है सबसे फलदायी
अष्टमी और नवमी तिथि के दिन सूर्योदय के बाद चौघड़िया के शुभ, लाभ या अमृत मुहूर्त में कंजक पूजन करना सबसे अधिक फलदायी माना गया है। पूजन के लिए सुबह 06:30 से 10:30 के बीच का समय सबसे उत्तम रहता है। राहुकाल का त्याग करके सही समय पर कन्याओं को भोजन कराने और उनका आशीर्वाद लेने से माता रानी अत्यंत प्रसन्न होती हैं और परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है। कंजक पूजन में 9 कन्याओं के साथ एक छोटे बालक (लांगुरा) को बिठाना अनिवार्य और अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है।
📋 कन्या पूजन की सही विधि और सत्कार के जरूरी नियम
- आदरपूर्वक आमंत्रण: कन्या पूजन की शुरुआत में सबसे पहले कन्याओं को बहुत सम्मान के साथ अपने घर पर आमंत्रित करें।
- चरण प्रक्षालन व आसन: स्वच्छ जल या दूध से कन्याओं के पैर धोएं और उन्हें आदर के साथ साफ आसन पर बिठाएं।
- तिलक व मौली बांधना: माथे पर कुमकुम, रोली और अक्षत का तिलक लगाएं और हाथों में सुरक्षा व सौभाग्य के रूप में मौली बांधें।
- सात्विक भोग परोसना: मां दुर्गा के पावन प्रसाद के रूप में पूरी, हलवा और काले चने बहुत प्रेमपूर्वक परोसें।
- चुनरी व दक्षिणा भेंट करना: भोजन के बाद उन्हें लाल चुनरी उड़ाएं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार फल, श्रृंगार सामग्री व दक्षिणा भेंट करें।
- चरण स्पर्श व आशीर्वाद: अंत में भक्ति भाव से उनके पैर छूकर आशीर्वाद लें और राहुकाल के समय पूजन करने से बचें।
👧 किस आयु की कन्या के पूजन से मिलती है कौन सी सिद्धि? (2 से 10 वर्ष का महत्व)
- दो वर्ष (कुमारी): घर में सुख, शांति और धन-धान्य की वृद्धि होती है।
- तीन वर्ष (त्रिमूर्ति): परिवार में सुख-समृद्धि और वैभव की प्राप्ति होती है।
- चार वर्ष (कल्याणी): सभी प्रकार के कार्यों में सफलता और पारिवारिक सुख मिलता है।
- पांच वर्ष (रोहिणी): व्यक्ति को उत्तम स्वास्थ्य और आरोग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
- छः वर्ष (कालिका): विद्या, बुद्धि और विशेष यश की प्राप्ति होती है।
- सात वर्ष (चंडिका): जीवन में ऐश्वर्य और अपार धन की प्राप्ति होती है।
- आठ वर्ष (शाम्भवी): समाज में मान-सम्मान और वाद-विवाद में विजय मिलती है।
- नौ वर्ष (दुर्गा): शत्रुओं पर विजय और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
- दस वर्ष (सुभद्रा): माता रानी भक्त के सभी संकट दूर करके उसकी हर इच्छा पूरी करती हैं।

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