उज्जैन। धर्मनगरी उज्जैन में आस्था और आध्यात्मिक परंपराओं के कई अनूठे सूत्र देखने को मिलते हैं। शक्तिपीठ हरसिद्धि देवी मंदिर के समीप शिप्रा नदी के तट पर स्थित मां कामाख्या का प्राचीन धाम इसी समृद्ध परंपरा की एक खास कड़ी है। धार्मिक मान्यताओं और इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर का इतिहास करीब 1,000 वर्ष पुराना है और इसका सीधा संबंध परमारकालीन राजा भोज के काल से जुड़ा हुआ है।
🌸 असम के कामाख्या मंदिर जैसी मान्यता: स्वयंभू प्रतिमा और 64 योगिनी व भैरव स्वरूपों की है उपस्थिति
असम के गुवाहाटी स्थित प्रसिद्ध मां कामाख्या मंदिर की तर्ज पर ही उज्जैन के इस धाम में भी तांत्रिक परंपराओं और शक्ति साधना का विशेष महत्व माना गया है। मंदिर के पुजारी लोकेश शर्मा के अनुसार यहाँ स्थापित देवी की प्रतिमा स्वयंभू है, जो खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थी। देवी के चारों ओर भैरव के स्वरूप और नाग आकृतियों से जुड़ी 64 योगिनी की धार्मिक मान्यता है। इसके अलावा मंदिर परिसर में भगवान गणेश, शिवलिंग और दक्षिणेश्वर महाकाली की प्रतिमाएं भी सुशोभित हैं।
🔮 वार्षिक रजस्वला परंपरा और विदेशी श्रद्धालुओं की आस्था: शोध की दृष्टि से भी अति महत्वपूर्ण है क्षेत्र
मंदिर के महंत आनंदपुरी महाराज (जूना अखाड़ा) के अनुसार यहाँ नवरात्रि के दौरान 10 महाविद्याओं की आराधना, हवन-यज्ञ और विशेष श्रृंगार अनुष्ठान होते हैं। इस मंदिर की सबसे विशिष्ट मान्यता यहाँ देवी के वार्षिक रजस्वला होने की है, जिसके चलते हर वर्ष 22 जून से 26 जून के बीच 5 दिनों तक पट बंद रहते हैं। यह परंपरा असम के अंबुबाची पर्व की याद दिलाती है। पद्मश्री डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित का कहना है कि पुरातात्विक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण इस क्षेत्र में यदि उत्खनन हो, तो कई प्राचीन रहस्य उजागर हो सकते हैं।

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