इंदौर। इंदौर के स्कीम-54 स्थित प्रतिष्ठित श्री सत्य साईं विद्या विहार स्कूल को कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने नगर निगम की ओर से जारी संपत्तिकर (Property Tax) की मांग को पूरी तरह सही ठहराते हुए स्कूल प्रबंधन को बकाया कर की राशि तुरंत जमा करने के सख्त निर्देश दिए हैं।
नगर निगम के मुताबिक, स्कूल पर फिलहाल करीब 4 करोड़ 30 लाख रुपये का संपत्तिकर बकाया है। इस निर्णय के साथ ही अब स्कूल प्रबंधन पर हर साल लगभग 45 लाख रुपये संपत्तिकर जमा करने का अतिरिक्त वित्तीय बोझ भी आ गया है। पिछले लंबे समय से कई निजी स्कूल व शिक्षण संस्थान संपत्तिकर से छूट का दावा करते रहे हैं, लेकिन इस अदालती निर्णय के बाद इस विषय पर एक नई कानूनी बहस छिड़ गई है।
📜 2020 से चल रहा था कानूनी विवाद: प्रतिभा पाल के नोटिस के खिलाफ कोर्ट पहुंचा था स्कूल
यह पूरा प्रकरण वर्ष 2020 से अदालत में चल रहा था। नगर निगम की तत्कालीन आयुक्त प्रतिभा पाल ने नवंबर 2020 में स्कूल प्रबंधन को संपत्तिकर जमा करने का आधिकारिक नोटिस जारी किया था। स्कूल प्रबंधन ने निगम की इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए जिला न्यायालय की शरण ली थी।
स्कूल की ओर से कोर्ट में यह तर्क प्रस्तुत किया गया था कि उनकी बिल्डिंग का उपयोग केवल शैक्षणिक गतिविधियों के लिए होता है, इसलिए नियमानुसार उस पर संपत्तिकर लागू नहीं होना चाहिए। सुनवाई के दौरान संपत्ति के कुल क्षेत्रफल को लेकर भी बड़ा अंतर सामने आया। स्कूल प्रबंधन ने अपने विवरण में परिसर का क्षेत्रफल करीब 64 हजार वर्गफीट बताया था, जबकि नगर निगम की वैज्ञानिक गणना में यह क्षेत्रफल करीब 3.45 लाख वर्गफीट पाया गया।
🏟️ खुले खेल मैदान और पार्किंग भी टैक्स के दायरे में: 2.11 लाख वर्गफीट ओपन एरिया शामिल
केस की सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से कोर्ट में मजबूती से पक्ष रखा गया कि स्कूल परिसर के भीतर मौजूद खुले खेल के मैदान और पार्किंग क्षेत्र पूरी तरह से स्कूल के ही उपयोग में हैं।
अदालत ने निगम के इस तर्क को स्वीकार करते हुए करीब 2 लाख 11 हजार वर्गफीट के खुले खेल क्षेत्र को भी संपत्तिकर की गणना के दायरे में माना। कोर्ट के अनुसार, यह जमीन स्कूल की बाउंड्रीवॉल के भीतर है और इसका उपयोग केवल स्कूल के विद्यार्थी ही करते हैं।
⚖️ गतिविधियां केवल धर्मार्थ नहीं: शुल्क लेने वाले संस्थानों को टैक्स फ्री मानने का आधार नहीं
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि जब स्कूल की ओर से विभिन्न शैक्षणिक और सह-शैक्षणिक गतिविधियों के लिए छात्रों से फीस ली जाती है, तो ऐसे में इसे पूरी तरह टैक्स फ्री मानने का कोई वैधानिक आधार नहीं बनता।
कोर्ट में नगर निगम का मुख्य तर्क था कि स्कूल की गतिविधियां केवल धर्मार्थ (Charitable) स्वरूप की नहीं हैं और परिसर में शुल्क आधारित गतिविधियां संचालित होती हैं। इसलिए इसे संपत्तिकर से पूरी तरह मुक्त नहीं किया जा सकता। अंततः कोर्ट ने नगर निगम की गणना और नोटिस को पूरी तरह सही मानते हुए लगभग 6 साल से चल रहे इस केस में स्कूल की अपील को खारिज कर दिया।

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