मध्य प्रदेश का शहडोल जिला एक प्रमुख आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहाँ की अधिकांश आबादी गांवों में निवास करती है और यहाँ के छोटे किसान खेती के साथ अतिरिक्त आय के स्रोतों की तलाश में रहते हैं। चूंकि यहाँ का अधिकांश इलाका वनों से आच्छादित है, इसलिए मुर्गी पालन यहाँ के किसानों के लिए एक परफेक्ट और बेहद फायदेमंद बिजनेस साबित हो सकता है। विशेष तौर पर बैकयार्ड पोल्ट्री (Backyard Poultry) में पाली जाने वाली खास नस्लें आदिवासी किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं, जो उन्हें कम समय में शानदार मुनाफा दिला सकती हैं।
🏡 बैकयार्ड पोल्ट्री की ‘स्टार’ है ग्राम प्रिया मुर्गी: कम जगह में तेजी से होता है विकास
बैकयार्ड पोल्ट्री का मतलब घर के पीछे या आसपास की उस छोटी सी खुली जगह से है, जिसका इस्तेमाल आमतौर पर रोजमर्रा के कामों या कबाड़ रखने के लिए किया जाता है। ऐसी जगहों पर मुर्गी पालन बेहद सफल हो सकता है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. बीके प्रजापति के अनुसार, हैदराबाद स्थित आईसीएआर (ICAR) केंद्र द्वारा विकसित ‘ग्राम प्रिया’ मुर्गी को बैकयार्ड पोल्ट्री की ‘स्टार’ नस्ल माना जाता है। शहडोल जैसे आदिवासी अंचल के किसानों के लिए यह नस्ल बहुत तेजी से ग्रोथ करती है और कम संसाधनों में भी बेहतरीन परिणाम देती है।
🥚 अंडे और मीट दोनों का बेहतरीन जरिया: 150 से 175 दिनों में शुरू हो जाती है अंडे देने की क्षमता
ग्राम प्रिया नस्ल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें घर के आसपास खुले में छोड़ा जा सकता है। यह मुर्गियां घर से निकलने वाले बचे हुए अनाज, कीड़े-मकोड़े और घास खाकर ही आसानी से पल जाती हैं और तेजी से वजन बढ़ाती हैं। यह मुर्गी 6 से 7 महीने (लगभग 150-175 दिन) में डेढ़ से दो किलो वजन प्राप्त कर लेती है और अंडे देना शुरू कर देती है। यह डबल-परपस नस्ल है, जिसका उपयोग मांस और अंडे दोनों के लिए किया जाता है। एक वर्ष में यह मुर्गी 225 से 230 तक अंडे दे सकती है, जिससे किसानों को प्रतिदिन नियमित आमदनी मिल सकती है।
🛡️ रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत और प्रतिकूल मौसम में भी सुरक्षित
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इस मुर्गी की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बहुत अधिक होती है, जिससे यह विपरीत और प्रतिकूल मौसम में भी आसानी से जीवित रह जाती है और इसमें बीमारियां कम फैलती हैं। किसान भाई अपनी जरूरत के अनुसार जब चाहें इन्हें बाजार में बेचकर मुनाफा कमा सकते हैं। बाजार में अंडों और मीट की अच्छी मांग होने के कारण यह आदिवासी अंचल के किसानों के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का एक बेहतरीन जरिया बन रहा है।

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