पूरे देश में रक्षाबंधन का पावन पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के कुछ इलाके ऐसे हैं जहाँ सामान्य तिथि के ठीक एक दिन बाद रक्षाबंधन का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं और कजलियां विसर्जित करती हैं। छतरपुर के उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे महाराजपुर, गौरिहार और बारीगढ़ जैसे क्षेत्रों में चली आ रही यह परंपरा महोबा के ऐतिहासिक युद्ध और आल्हा-ऊदल की वीरगाथा से गहराई से जुड़ी हुई है, जिसे स्थानीय लोग आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं।
⚔️ आल्हा-ऊदल के समय का इतिहास: जब पृथ्वीराज चौहान की सेना ने राजकुमारी को घेरा था
महाराजा छत्रसाल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. सिंह परमार के अनुसार, वर्ष 1182 में राजा परमाल की पुत्री राजकुमारी चंद्रावलि अपनी 1400 सखियों के साथ कीरत सागर तालाब में कजलियां विसर्जित करने जा रही थीं। तभी रास्ते में पृथ्वीराज चौहान के सेनापति चामुंडा राय ने उन पर हमला बोल दिया था, क्योंकि पृथ्वीराज राजकुमारी का विवाह अपने पुत्र से कराना चाहते थे। रक्षाबंधन के दिन घटी इस घटना के दौरान महारानी मल्हना ने मुकाबला किया, जिसमें राजकुमार अभय वीरगति को प्राप्त हुए। इसके बाद वीर योद्धा आल्हा और ऊदल ने अपने मित्र मलखान के साथ मोर्चा संभालकर राजकुमारी की रक्षा की थी, जिसके बाद से इस क्षेत्र में एक दिन बाद पर्व मनाने की परंपरा शुरू हुई।
✨ शुक्रवार और सुकर्मा योग का संयोग: ज्योतिषीय दृष्टि से बेहद खास रहा इस बार का पर्व
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस बार रक्षाबंधन के साथ सुकर्मा योग का बेहद उत्तम संयोग बना। ज्योतिषीय मान्यताओं में शुक्रवार का संबंध शुक्र ग्रह से माना जाता है, जो प्रेम, सुख-सुविधा, सौंदर्य और पारिवारिक सौहार्द का प्रतीक है। इसके अलावा चंद्रमा की स्थिति और नक्षत्रों के प्रभाव के कारण यह पर्व पारिवारिक एकता और आपसी स्नेह को प्रगाढ़ करने वाला रहा। ज्योतिषीय दृष्टि से इस योग ने भाई-बहन के पवित्र रिश्ते में मिठास और सामंजस्य को और बढ़ाया।
👥 स्थानीय लोगों की मान्यता: पीढ़ी दर पीढ़ी निभाई जा रही है परंपरा
गौरिहार निवासी वीरेंद्र पटेल बताते हैं कि उनके क्षेत्र में तय तिथि पर राखी नहीं बांधी जाती, बल्कि परंपरा के अनुसार अगले दिन यानी 29 अगस्त को ही बहनें भाइयों को राखी बांधती हैं। वहीं, बारीगढ़ के रहने वाले राजा राजपूत का कहना है कि जब तक कजलियां नहीं निकलतीं और उनका विसर्जन नहीं होता, तब तक उत्सव नहीं मनाया जाता। आल्हा-ऊदल के काल से चली आ रही यह अनूठी परंपरा आज भी बुंदेलखंड की सांस्कृतिक धरोहर को संजोए हुए है।

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