जबलपुर। मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का संवेदनशील मुद्दा एक बार फिर सूबे की राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। आरक्षण से जुड़ी चल रही न्यायिक कार्यवाही के बीच कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेताओं के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। कांग्रेस का मुख्य आरोप है कि राज्य सरकार अदालत में आरक्षण के पक्ष को प्रभावी ढंग से नहीं रख पाई, जबकि भाजपा का पलटवार है कि इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ में पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार का जल्दबाजी में लाया गया वह अध्यादेश था, जिसके चलते मामला उलझ गया।
🏛️ भेड़ाघाट संगम में बन रही प्रदेशव्यापी रणनीति: 230 विधानसभा सीटों पर आरक्षण का मुद्दा उठाने पर मंथन
कानूनी मोर्चे के साथ-साथ इस मामले में सामाजिक और राजनीतिक लामबंदी भी तेजी से बढ़ रही है। जबलपुर के ऐतिहासिक पर्यटन स्थल भेड़ाघाट में 17 और 18 अक्टूबर को आयोजित दो दिवसीय ‘पिछड़ा वर्ग संगम’ में प्रदेशभर के विभिन्न ओबीसी संगठनों के प्रतिनिधि बड़ी संख्या में जुटे हैं। इस महाकुंभ में न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका में पिछड़ा वर्ग के समुचित प्रतिनिधित्व सहित आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए 230 सीटों पर इस मुद्दे को मुखरता से उठाने और आगे की रणनीति तय करने पर गहन विचार-विमर्श किया जा रहा है।
🗣️ विवेक तन्खा और राकेश सिंह आमने-सामने: कांग्रेस और बीजेपी ने एक-दूसरे पर मढ़े लापरवाही के आरोप
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने राज्य सरकार की पैरवी पर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि भाजपा सरकार अदालत में आवश्यक आंकड़े और तथ्य प्रभावी ढंग से पेश करने में विफल रही। दूसरी ओर, प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह ने कड़ा जवाब देते हुए कहा कि इस विवाद की शुरुआत कमलनाथ सरकार के जल्दबाजी वाले फैसले से हुई थी, जिसमें पर्याप्त कानूनी आधार नहीं थे। बहरहाल, हाई कोर्ट के स्पष्ट रुख और सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर होने के बाद इस मामले ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है, जिससे राज्य का सियासी पारा गर्मा गया है।

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