तेहरान और वाशिंगटन के बीच जारी तनावपूर्ण संघर्ष के बीच, अमेरिका ने आज बुधवार को इराक से अपनी सैन्य वापसी आधिकारिक रूप से पूरी कर ली है. इसके साथ ही साल 2003 में सद्दाम हुसैन की सरकार के पतन के बाद शुरू हुई अमेरिकी सैन्य मौजूदगी का 23 साल से चले आ रहे एक लंबे और घटनापूर्ण अध्याय का अंत हो गया है.
हालांकि, दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और द्विपक्षीय सुरक्षा संबंध पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं. लेकिन इस अहम बदलाव से पश्चिम एशिया के शक्ति-संतुलन में एक बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव आने की संभावना है.
कैसा रहा 23 साल का सफर?
अमेरिका के नेतृत्व वाली सेनाओं ने 20 मार्च 2003 को इराक पर हमला कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप सद्दाम हुसैन की सत्ता का पतन हुआ. फिर धीरे-धीरे अमेरिका का दबदबा बढ़ता गया. फिर 2007 तक अमेरिकी तैनाती अपने चरम पर थी, इस दौरान इराक में 1.70 लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मौजूद थे.
हालांकि दिसंबर 2011 में अमेरिका ने अपने अंतिम लड़ाकू सैनिकों को वापस बुला लिया था. लेकिन इस बीच 2014 में इस्लामिक स्टेट (ISIS) के तीव्र उभार के बाद अमेरिकी सेना को ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व के तहत फिर से इराक में लौटना पड़ा.
इस बीच बातचीत का दौर भी चलता रहा. वाशिंगटन और बगदाद के बीच 2024 में हुए समझौते के तहत अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन के मिशन को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने का निर्णय लिया गया था, जिसके तहत अंतिम समयसीमा 30 सितंबर 2026 तय की गई थी. अंतिम चरण में सक्रिय करीब 1,500 से 2,500 अमेरिकी और गठबंधन कर्मी भी अब इराक छोड़ चुके हैं.
सामने खड़ी ये बड़ी सुरक्षा चुनौतियां
अमेरिकी सैनिकों की इस अंतिम विदाई के बाद इराक के आंतरिक और क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे के सामने तीन मुख्य और गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. पहला, ईरान समर्थित मिलिशिया और क्षेत्रीय प्रभाव. अमेरिकी सैन्य मौजूदगी लंबे समय से ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव के सामने एक बड़ा अवरोध मानी जाती थी. अमेरिका की वापसी से तेहरान और उसके समर्थक सशस्त्र समूहों को राजनीतिक तथा सुरक्षा व्यवस्था में अपना प्रभाव और मजबूत करने का बड़ा मौका मिल सकता है. हालांकि, इराकी सरकार के सामने गैर-राज्य सशस्त्र समूहों के हथियारों को राज्य के नियंत्रण में लाने की एक बड़ी चुनौती है.
दूसरा, ISIS के स्लीपर सेल का खतरा बना हुआ है. भले ही ISIS का क्षेत्रीय नियंत्रण खत्म हो चुका है, लेकिन उसके स्लीपर सेल अभी भी सक्रिय हैं. अमेरिकी खुफिया, ड्रोन और लॉजिस्टिक सहायता मिलने बंद होने से इराकी सुरक्षा बलों को आतंकवाद विरोधी अभियानों में स्वतंत्र रूप से अधिक कड़े कदम उठाने होंगे. अमेरिका अब इस क्षेत्रीय निगरानी और आतंकवाद विरोधी अभियान के ढांचे को जॉर्डन से संचालित करने की योजना बना रहा है.
एयर डिफेंस क्षमता में बदलाव बड़ी चुनौती
तीसरा, एयर डिफेंस क्षमता में बदलाव बड़ी चुनौती है. अमेरिकी सेना के जाने से एरबिल (इराकी कुर्दिस्तान) और अन्य ठिकानों से पैट्रियट (Patriot) एयर डिफेंस सिस्टम और रडार प्रणालियां हटा ली गई हैं. मौजूदा ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच हवाई हमलों के खतरों से निपटने के लिए इराक को अब अपनी खुद की राष्ट्रीय एकीकृत एयर डिफेंस प्रणाली को जल्द से जल्द मजबूत करना होगा.यह विदाई केवल सैनिकों की वापसी भर नहीं है, बल्कि यह इराक की घरेलू राजनीति और मध्य-पूर्व की भू-राजनीति का एक नया अध्याय है. युद्ध के इन 2 दशकों में करीब 4,500 अमेरिकी सैनिकों ने अपनी जान गंवाई. अब अमेरिकी सैन्य मिशन के अंत के बाद, यह देखना बेहद अहम होगा कि बगदाद सरकार अपनी संप्रभुता, आंतरिक सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन को किस प्रकार संभालती है. या इस पूरे क्षेत्र में ईरान का दबदबा कायम होगा.

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