देशभर में विजयादशमी का पावन पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है और शाम ढलते ही जगह-जगह रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतलों का दहन होता है। लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर सदियों से रावण दहन हमेशा शाम के समय ही क्यों किया जाता है? वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस के अनुसार, भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध लगातार 10 दिनों तक चला था। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को जब सूर्य ढलने की ओर था (यानी अपरान्ह काल), उसी संधि बेला में विभीषण के संकेत पर भगवान राम ने रावण की नाभि में अमोघ बाण चलाकर उसका अंत किया था। यह क्षण दिन का चौथा प्रहर था, जिसे ‘विजय मुहूर्त’ कहा जाता है।
🔥 बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है दशहरा: अहंकार के पतन और शमी पूजन का जानें विशेष धार्मिक महत्व
दशहरे के दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाने की परंपरा केवल एक ऐतिहासिक घटना की याद नहीं है, बल्कि यह इंसान के भीतर छिपे अहंकार, अधर्म और बुराइयों को त्यागने का भी प्रतीक है। रावण महाज्ञानी और भगवान शिव का परम भक्त था, लेकिन उसके अहंकार और अधर्म ने उसका विनाश कर दिया। धर्म शास्त्रों में विजय मुहूर्त को किसी भी शुभ कार्य, सफलता और साहस के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। इसी वजह से विजयादशमी के दिन प्रदोष काल व विजय मुहूर्त में रावण दहन के साथ-साथ भगवान श्रीराम, देवी अपराजिता की आराधना और शमी वृक्ष की पूजा करने की विशेष परंपरा प्रचलित है।

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