उमरिया। बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान से अचानकमार तक फैले बाघों के अति-संवेदनशील प्राकृतिक गलियारे (टाइगर कॉरिडोर) के आसपास कोयला खनन परियोजनाओं को लगातार मिल रही मंजूरियों ने प्रदेश में सियासी पारे को चढ़ा दिया है।
उमरिया जिले में प्रस्तावित ‘वेस्ट ऑफ शहडोल (साउथ) अंडरग्राउंड कोल माइन’ को लेकर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह नई प्रस्तावित परियोजना बांधवगढ़-अचानकमार टाइगर कॉरिडोर से महज 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) ने 8 और 9 सितंबर को आयोजित बैठकों में इस परियोजना के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति देने की सिफारिश की है। जुलाई के बाद से इस कॉरिडोर के आसपास यह चौथी कोयला खनन परियोजना है जिसे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मंजूरी की दिशा में आगे बढ़ाया गया है।
⛏️ 53 मीटर से लेकर 6 किलोमीटर तक खनन परियोजनाएं: कॉरिडोर के अस्तित्व पर मंडराया संकट
जीतू पटवारी ने अपने पोस्ट में सवाल उठाया कि आखिर बाघों की निर्बाध आवाजाही वाले इस अत्यंत महत्वपूर्ण प्राकृतिक कॉरिडोर के आसपास ताबड़तोड़ खनन परियोजनाओं को अनुमति क्यों दी जा रही है।
उपलब्ध आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, इससे पहले पाथोरा ईस्ट परियोजना कॉरिडोर से करीब 1.5 किलोमीटर, मरवाटोला VII महज 53 मीटर और अर्जुनी वेस्ट करीब 3.9 किलोमीटर की दूरी पर स्वीकृत की गई हैं। अब ‘वेस्ट ऑफ शहडोल (साउथ)’ परियोजना भी महज 6 किलोमीटर दूर प्रस्तावित है। पटवारी ने इसे केवल एक खदान तक सीमित मामला न बताते हुए सरकार से पूछा कि जब वन्यजीव संरक्षण के दृष्टिकोण से यह गलियारा अत्यंत संवेदनशील है, तो इसके इतने समीप भारी उत्खनन की अनुमति देने का वैधानिक आधार क्या है।
🌲 1,400 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैली है परियोजना: 960 हेक्टेयर से ज्यादा वनभूमि होगी प्रभावित
विभागीय रिपोर्टों के मुताबिक, ‘वेस्ट ऑफ शहडोल (साउथ)’ भूमिगत कोयला खदान का कुल लीज क्षेत्र 1,400 हेक्टेयर से भी अधिक है, जिसमें से 960 हेक्टेयर से ज्यादा हिस्सा घने वन क्षेत्र का आता है।
हालांकि यह परियोजना भूमिगत खनन (Underground Mining) पर आधारित है, लेकिन पर्यावरणीय और वन्यजीव स्वीकृतियों की प्रक्रिया में वन भूमि और कॉरिडोर की कनेक्टिविटी से जुड़ी कड़ी शर्तें बेहद मायने रखती हैं।
🐾 NTCA की चेतावनियों को दरकिनार करने का आरोप: जीतू पटवारी ने सीएम से माँगा जवाब
जीतू पटवारी ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की चेतावनियों का हवाला देते हुए राज्य सरकार से सीधा सवाल किया कि यदि बाघ गलियारे की कनेक्टिविटी और पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंताएं पहले से ही आधिकारिक दस्तावेजों में दर्ज हैं, तो उनके आसपास खनन की अनुमतियां कैसे जारी हो रही हैं।
एनटीसीए और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के शोध पत्रों में बांधवगढ़-अचानकमार कॉरिडोर को दो प्रमुख बाघ आबादी क्षेत्रों को जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण मार्ग माना गया है। ऐसे कॉरिडोर बाघों के स्वतंत्र आवागमन और जेनेटिक विविधता (आनुवंशिक संपर्क) को बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
⚖️ विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन पर छिड़ी बहस: सरकार के रुख पर टिकीं सभी की निगाहें
यद्यपि पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा परियोजनाओं की मंजूरी के दौरान कड़ी शर्तें और वन्यजीव प्रबंधन योजनाएं अनिवार्य की जाती हैं, फिर भी वर्तमान में मुख्य बहस इस बात पर केंद्रित है कि उमरिया में कोयला खनन और बाघों के प्राकृतिक संरक्षण के बीच जमीनी संतुलन कैसे कायम होगा।
कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से एनटीसीए की अनुशंसाओं से जुड़ी रिपोर्ट और राज्य सरकार का इस विषय पर आधिकारिक पक्ष सार्वजनिक करने की मांग की है। इस तीखे हमले के बाद अब सभी की नजरें सरकार और वन विभाग के आगामी स्पष्टीकरण और ठोस कदमों पर टिक गई हैं।

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