मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है। मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के तीन युवा खिलाड़ी स्नेहा दावदे, जितेंद्र वाघ और अर्जुन वास्कले इस कहावत को अपनी मेहनत और पक्के इरादों से सच साबित कर रहे हैं। गंभीर आर्थिक तंगी, संसाधनों की भारी कमी, शारीरिक चुनौतियों और तमाम कठिन परिस्थितियों के बावजूद इन खिलाड़ियों ने अपने दम पर राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश और जिले का नाम रोशन किया है। अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के अवसर पर इन तीनों ही होनहारों के संघर्ष और सफलता की यह कहानी हर युवा के लिए एक बड़ी प्रेरणा बनकर सामने आती है।
🏒 हॉकी खिलाड़ी स्नेहा दावदे: मां करती थीं बर्तन साफ, सिर पर पट्टी बंधे होने के बावजूद मैदान में उतरीं
बड़वानी की स्नेहा दावदे का जीवन संघर्षों के बीच शुरू हुआ। उनके पिता एक जूते की दुकान पर काम करते थे, जबकि मां दूसरों के घरों में बर्तन साफ कर परिवार का पेट पालती थीं। ऐसे में खेल किट और पौष्टिक डाइट का खर्च उठाना बहुत कठिन था, लेकिन स्नेहा का हॉकी के प्रति जुनून कभी कम नहीं हुआ। सिर में गंभीर चोट लगने और पट्टी बंधी होने के बाद भी उन्होंने खेलना नहीं छोड़ा। कोच मुकेश राठौर की मदद से उनका चयन राज्य अकादमी में हुआ, जिसके बाद वह भारतीय अंडर-18 महिला हॉकी टीम का हिस्सा बनीं। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मुकाबला खेलने के बाद अब वह जापान में होने वाली एशियन चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।
🏏 दिव्यांगता को बनाई ताकत: सिंगापुर में तिरंगा फहराने वाले क्रिकेटर जितेंद्र वाघ की कहानी
पानसेमल के मोरतलाई गांव के रहने वाले जितेंद्र वाघ की राह भी आसान नहीं थी। आर्थिक तंगी के साथ शारीरिक दिव्यांगता उनके सामने एक बड़ी चुनौती थी। उनके पिता मोटर वाइंडिंग का काम करते थे। हालांकि, जितेंद्र ने अपनी शारीरिक कमजोरी को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया और दोस्तों के सहयोग से क्रिकेट से अपना रिश्ता जोड़े रखा। उनकी कड़ी मेहनत रंग लाई और उनका चयन भारतीय दिव्यांग क्रिकेट टीम में हुआ। इसके बाद उन्होंने सिंगापुर में आयोजित इन्फिनिटी स्पिरिट कप में देश का प्रतिनिधित्व करते हुए शानदार प्रदर्शन किया और अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का मान बढ़ाया।
🏅 खेतों की पगडंडियों से इंटरनेशनल ट्रैक तक: 23 राष्ट्रीय पदक जीतने वाले एथलीट अर्जुन वास्कले
ठीकरी के छोटे से गांव नायदड़ के रहने वाले अर्जुन वास्कले ने साबित कर दिया कि प्रतिभा को निखारने के लिए महंगे संसाधनों से ज्यादा मजबूत हौसले की जरूरत होती है। आधुनिक ट्रैक के अभाव में उन्होंने खेतों की पगडंडियों, स्कूल के मैदान और कच्ची सड़कों को ही अपना अभ्यास स्थल बनाया। भोपाल खेल अकादमी में चयन के बाद उन्होंने पिछले छह वर्षों में 23 राष्ट्रीय पदक अपने नाम किए। दक्षिण एशियाई सीनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप की 1500 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीतने वाले अर्जुन को मध्य प्रदेश सरकार एकलव्य पुरस्कार से भी नवाज चुकी है, और अब उनका अगला बड़ा लक्ष्य ओलंपिक में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतना है।

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