मध्य प्रदेश की मालवा भूमि अपनी त्याग, तपस्या और समृद्धि के साथ-साथ अपनी समृद्ध कला, संगीत और चित्र शैलियों के लिए भी देश-दुनिया में पहचानी जाती है। हालांकि, बदलते दौर और आधुनिकता की अंधी दौड़ के बीच यहां की प्राचीन लघु चित्र शैली (Miniature Painting) आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। इस ऐतिहासिक कला धरोहर को विलुप्त होने से बचाने के लिए पहली बार कला जगत के पारखी और उभरते चित्रकार एक मंच पर आकर मंथन कर रहे हैं।
📜 मध्य प्रदेश और मालवा से पूरी तरह विलुप्त हो चुकी है सन 1360 की कल्पसूत्र पांडुलिपि शैली
इतिहासकारों के मुताबिक, सन 1360 में जैन चित्र शैली की ‘कल्पसूत्र’ नामक पारंपरिक लघु चित्रकला को मालवा की बड़ी विरासत माना जाता था। लेकिन आज यह शैली न सिर्फ मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे मालवा क्षेत्र से भी लगभग विलुप्त हो चुकी है। मौजूदा स्थिति यह है कि इस दुर्लभ चित्र शैली से तैयार किया गया एक भी मूल चित्र अब राज्य की किसी भी आर्ट गैलरी या संग्रहालय में उपलब्ध नहीं है, और इसके अवशेष अब देश के चुनिंदा संस्थानों तक ही सीमित रह गए हैं।
🏛️ देश के इन गिने-चुने संग्रहालयों और संस्थानों में सुरक्षित बचे हैं दुर्लभ चित्र
पुणे के प्रख्यात चित्रकार राजेश पाटील बताते हैं कि मालवा की यह लघु चित्र शैली 1360 में विकसित होकर रंग-प्रधान चित्रों के रूप में सामने आई थी। लेकिन संरक्षण के अभाव में आज इसके गिने-चुने चित्र ही देश भर में बचे हुए हैं। इनमें से अधिकांश लघु चित्र वाराणसी के भारत कला भवन, अहमदाबाद के कानोरिया आर्ट सेंटर और पटना के पोद्दार इंस्टीट्यूट में ही सुरक्षित रखे हुए हैं।
🖌️ इंदौर ललित कला महाविद्यालय की अनूठी पहल: कार्यशाला के जरिए नई पीढ़ी को सिखाए जा रहे गुर
मालवा की इस प्राचीन कला धरोहर को पुनर्जीवित करने के लिए पहली बार इंदौर के शासकीय ललित कला महाविद्यालय में एक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। कॉलेज की फैकल्टी गुंजन लद्दड़ा योगी ने बताया कि इस लघु चित्रकला में पुराने कलाकार मांडना जैसी चित्रकारी करते थे, जिसमें लोक कलाओं के समानांतर मोटी रेखाओं और मोटे रंगों की परतों का इस्तेमाल किया जाता था। समय के साथ इसमें धार्मिक कथानकों और पौराणिक पात्रों को भी स्थान मिला।
👑 राज वैभव और भगवान कृष्ण की लीलाओं को दर्शाती थी ‘मालवा कलम’
विशेषज्ञों का कहना है कि इस शैली का विस्तार मालवा से लेकर राजस्थान के बूंदी और बुंदेलखंड के ओरछा तक फैला हुआ था, जिसे उस दौर में ‘मालवा कलम’ कहा जाता था। आज जो इसके प्रिंट्स बचे हैं, उनमें भारतीय राज वैभव के अलावा भगवान कृष्ण और रामायण के पात्रों को प्रकृति और राजसी इमारतों के बीच दर्शाया गया है। कॉलेज में हो रही इस कार्यशाला के माध्यम से विषय विशेषज्ञ नवोदित चित्रकारों को इस प्राचीन कला से रूबरू करा रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ी हमारी इस महान सांस्कृतिक विरासत को जान और समझ सके।

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