October 6, 2026

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Madhya Pradesh High Court: पैतृक संपत्ति विवाद मामले में जस्टिस अनुराधा शुक्ला की बड़ी टिप्पणी, लैंगिक पूर्वाग्रह पर तल्ख तेवर

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने महिलाओं की योग्यता, क्षमता और कानूनी मामलों में उनकी भूमिका को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने विदिशा जिले के गंजबासौदा से जुड़े एक पैतृक संपत्ति के मामले की सुनवाई करते हुए न सिर्फ निचली अदालत के तर्कों पर गहरी नाराजगी जाहिर की, बल्कि उसके फैसले को ‘माइसोजेनेटिक’ यानी पूर्वाग्रह से ग्रसित और महिला विरोधी करार दिया है। अदालत के इस फैसले से न्यायिक प्रक्रियाओं में लैंगिक समानता को लेकर एक बार फिर बड़ी बहस छिड़ गई है।

📜 पैतृक संपत्ति विवाद और देरी का मामला: एडीजे कोर्ट ने 35 साल की महिला पर पुरुषों की निर्भरता को बताया था अनुचित

यह पूरा कानूनी विवाद पैतृक संपत्ति के बँटवारे से जुड़ा है, जिसमें गंजबासौदा की रहने वाली जुगरी और उनके परिवार के सदस्यों ने 2011 में दीवानी कोर्ट में याचिका दायर की थी। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने सबूतों के अभाव का हवाला देकर दावा खारिज कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता मोहरा बाई ने एडीजे कोर्ट में पहली अपील दायर की, जिसमें बीमारी के कारण 18 दिन की देरी हो गई थी। गंजबासौदा एडीजे कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए यह तर्क दिया था कि 35 साल की महिला पर परिवार के बड़े और बुजुर्ग पुरुष कानूनी कार्यों के लिए कैसे निर्भर रह सकते हैं, और इसी आधार पर देरी को अनुचित ठहरा दिया गया था।

🔍 जस्टिस अनुराधा शुक्ला का कड़ा फैसला: निचली अदालत के तर्कों को नकारा, अब 15 अक्टूबर को गंजबासौदा कोर्ट में होगी सुनवाई

साल 2015 से ग्वालियर हाईकोर्ट में चल रहे इस मामले में जस्टिस अनुराधा शुक्ला ने सुनवाई पूरी कर 1 अक्टूबर को अपना फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि परिवार की किसी महिला पर अन्य सदस्यों की निर्भरता को कम आंकना और इस तरह के अटकलें भरे अनुमान लगाना पूरी तरह लैंगिक पूर्वाग्रह को दर्शाता है। हाईकोर्ट ने द्वितीय अपील को स्वीकार करते हुए देरी को माफ कर दिया और मामले को दोबारा सुनवाई के लिए नीचे की अदालत में वापस भेज दिया है। साथ ही, केस से जुड़े सभी पक्षों को आगामी 15 अक्टूबर को गंजबासौदा एडीजे कोर्ट के समक्ष पेश होने के निर्देश दिए गए हैं।

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