छतरपुर। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और संवेदनहीनता को उजागर करने वाला एक बेहद दुखद और शर्मनाक मामला सामने आया है। छतरपुर जिला अस्पताल में समय पर इलाज और जांच सुविधाएं न मिलने के कारण एक मजबूर प्रसूता ने सड़क पर ही बच्चे को जन्म दे दिया।
दुर्भाग्य से नवजात की मौत गर्भ में ही हो चुकी थी। इस हृदयविदारक घटना के बाद से ही सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कलई खुल गई है और स्थानीय लोगों में अस्पताल प्रशासन के खिलाफ भारी आक्रोश व्याप्त है।
🚶♂️ अस्पताल में सुविधा होने के बावजूद निजी सेंटर भेजा, सोनोग्राफी के इंतजार में सड़क पर दर्द से तड़पती रही महिला
यह घटना राजनगर थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम खजवा की है। खजवा निवासी 40 वर्षीय गर्भवती महिला आरती पटेल को राजनगर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से जिला अस्पताल छतरपुर के लिए रेफर किया गया था। लेकिन जिला अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने अस्पताल के अंदर सोनोग्राफी सुविधा बंद होने का हवाला देते हुए परिजनों को बाहर से जांच कराने के लिए भेज दिया। जबकि परिजनों का आरोप है कि जिला अस्पताल में सोनोग्राफी की सुविधा उपलब्ध है।
अस्पताल से बाहर भेजे जाने के बाद मजबूर परिजन महिला को पास के ही एक निजी सोनोग्राफी सेंटर ले गए। पीड़ित परिवार का आरोप है कि सोनोग्राफी सेंटर पर ₹1,000 जमा करवाकर नंबर लगवाया गया था। करीब आधे घंटे तक इंतजार करने के दौरान महिला को असहनीय प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। दर्द से बेहाल प्रसूता पास ही स्थित एक मेडिकल स्टोर के सामने जाकर बैठ गई और सड़क पर ही तड़पने लगी, जिसके कुछ ही देर बाद सड़क पर ही उसकी डिलीवरी हो गई।
🩺 स्थानीय महिलाओं की मदद से पहुंचीं स्टाफ नर्स, प्राथमिक उपचार के बाद प्रसूता वार्ड में किया गया भर्ती
सड़क पर महिला को तड़पते देख आसपास खड़ी स्थानीय महिलाओं ने तुरंत उसकी मदद की और घटना की सूचना जिला अस्पताल के प्रसूता वार्ड में दी।
जैसे ही मामले की जानकारी अस्पताल स्टाफ को मिली, उन्होंने तुरंत व्हीलचेयर और प्रशिक्षित स्टाफ नर्स को मौके पर भेजा। मेडिकल दुकान के बाहर ही आवश्यक प्राथमिक चिकित्सा प्रक्रिया पूरी करने के बाद महिला को सुरक्षित व्हीलचेयर से अस्पताल लाकर प्रसूता वार्ड में भर्ती कराया गया, जहां फिलहाल उसका इलाज जारी है। हालांकि, बच्चे की मौत की खबर सुनते ही परिजन फूट-फूट कर रोने लगे।
⚖️ “अस्पताल में तुरंत इलाज मिलता तो बच सकती थी बच्चे की जान”: परिजनों का आरोप, CMHO ने दिए जांच के आदेश
पीड़िता के पति ताई पटेल ने रोते हुए बताया, “यदि समय रहते अस्पताल में ही हमारी सोनोग्राफी कर दी जाती और डॉक्टर तुरंत इलाज शुरू कर देते, तो शायद मेरे बच्चे की जान बचाई जा सकती थी।” वहीं परिजन वीरेंद्र पटेल ने कहा कि अस्पताल प्रबंधन ने जानबूझकर निजी सेंटर भेजा था, जहां दर्द बढ़ने के कारण सड़क पर ही डिलीवरी हो गई और नवजात मृत पैदा हुआ।
इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए छतरपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. आर.पी. गुप्ता ने कहा, “मामला मेरे संज्ञान में आ चुका है। पूरे घटनाक्रम की गहन जांच कराई जाएगी और जो भी दोषी पाया जाएगा उसके खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।”

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