उज्जैन: भारत नॉर्वेजियन सूचना सांस्कृतिक फोरम द्वारा अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी प्रवासी साहित्य और अनुवाद के योगदान पर केंद्रित थी। इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन भी आयोजित किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के विभागाध्यक्ष एवं कुलानुशासक प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा थे। अध्यक्षता ओस्लो नॉर्वे के वरिष्ठ साहित्यकार सुरेशचन्द्र शुक्ल शरद आलोक ने की।
मुख्य वक्ता प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने विश्व पटल पर प्रवासी साहित्य की विस्तृत यात्रा का वर्णन करते हुए अनेक प्रवासी साहित्यकारों के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रवासी साहित्य ने विभिन्न सभ्यताओं, भाषा और विचारों के बीच सेतु बनाने का कार्य किया है। प्रवासी भारतीयों के साहित्य में भारतीय जड़ों से जुड़ाव के साथ अलगाव, अकेलापन, मूल्य एवं संस्कृतिगत अंतर, जीवन संघर्षों का जीवंत चित्रण मिलता है। प्रो. शर्मा ने प्रवासी साहित्य के अनुवाद का जिक्र करते हुए कहा कि जैसे सुरेशचन्द्र शुक्ल शरद आलोक ने मूल नार्विजन और डेनिश भाषा से सीधे हिन्दी में अनुवाद किया यह महत्वपूर्ण है। शुक्ल जी का लॉकडाउन काव्यसंग्रह कोरोनाकाल में मानवीय सरोकारों की प्रथम काव्यकृति है, उसके लिए शरद आलोक को साधुवाद के पात्र हैं। उन्होंने प्रमुख प्रवासी कवियों की कविताओं का पाठ भी किया।
प्रो. अनवर अहमद सिद्दीकी, वर्धा ने प्रवासी साहित्यकारों के अनुवाद पर प्रकाश डालते हुए अनेक साहित्यकारों का जिक्र किया और शरद आलोक द्वारा अनुवाद की हुई कृतियों पर विस्तृत चर्चा की।
साहित्य अकादमी द्वारा अनुवाद की स्वरचित पुस्तक पर पुरस्कार प्राप्त डॉ. अर्जुन चौहान कोल्हापुर ने सैद्धांतिक और व्यावहारिक पक्ष पर रोचक चर्चा की।
पूर्व कुलपति एवं चेन्नई में दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की निदेशक प्रो. निर्मला एस मौर्य ने बताया कि उन्होंने अनुवाद के तुलनात्मक अध्याय पर भी शोध कराया और सैकड़ों छात्र – छात्राओं का निर्देशन करते हुए सुरेशचन्द्र शुक्ल शरद आलोक के साहित्य पर दो शोध कराये। उन्होंने 2009 में अपनी नार्वे की यात्रा का जिक्र करते हुए अनेक संस्मरण सुनाये और उनके भारत-नार्वे के मध्य सांस्कृतिक सेतु के लिए साहित्यिक योगदान को जरूरी बताया।
विभिन्न विश्वविद्यालयों से वर्तमान और पूर्व शिक्षकों ने अपने वक्तव्य में अनुवाद और प्रवासी साहित्य पर प्रकाश डाला, जिनमें सर्वप्रथम प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा कुलनुशासक एवं विभागाध्यक्ष हिन्दी विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन, प्रो. निर्मला एस. मौर्य पूर्व कुलपति वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, डॉ. अनवर अहमद सिद्दीकी, प्रोफेसर महात्मा गांधी हिन्दी अन्तरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा, डॉ. अर्जुन चौहान पूर्व विभागाध्यक्ष हिन्दी शिवाजी विश्वविद्यालय कोल्हापुर, प्रो. रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव विभागाध्यक्ष नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय नालंदा, फिल्माचार्य आनन्द शर्मा वैश्विका फिल्म्स लखनऊ आदि मुख्य थे।
अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन में गोपालदास नीरज की पुण्यतिथि पर उनका स्मरण किया गया
अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन में भारत से काव्यपाठ करने वालों में डॉ. वीणा विज उदित जालंधर, शशि पराशर, प्रमिला कौशिक दिल्ली, डॉ. सुषमा सौम्या सम्मिलित हुए। सौम्या जी ने स्व. विप्लव जी की कविता का भी पाठ किया एवं अपर्णा गुप्ता लखनऊ तथा डॉ. ऋषि कुमार मणि त्रिपाठी कबीर नगर उत्तर प्रदेश, डॉ. नमिता आर्य पुणे, डॉ. अर्जुन चौहान कोल्हापुर एवं कोमल चुघ भुसावल (महाराष्ट्र), प्रो. रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव नालंदा बिहार और प्रो. निर्मला एस. मौर्य चेन्नई ने सस्वर काव्यपाठ किया जिसे सभी ने सराहा।
सांद्रा लुटावन सूरीनाम दक्षिण अमेरिका ने काव्यपाठ किया जिसे सभी ने सराहा। 180 वर्ष पहले भारतीय सूरीनाम गये थे जिनसे भारत का गहरा रिश्ता है जिन्होंने भाषा और संस्कृति के माध्यम से मूल देश से रिश्ता बनाया हुआ है। विदेश से काव्यपाठ करने वालों में डॉ. सत्येन्द्र कुमार सेठी कनाडा, डॉ. मीरा सिंह, डॉ. राम बाबू गौतम और सुषमा महरोत्रा यू एस ए, नार्वे से सुरेशचन्द्र शुक्ल ने स्वरचित कविता के अलावा फ़्रांस की डॉ. सरस्वती जोशी और फ़िजी की सुएता चौधरी की कविताओं का पाठ किया और प्रवासी और अप्रवासी साहित्य की आलोचना में डॉ. दीपक पाण्डेय, डॉ. पूनम पाण्डेय और प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा का नाम महत्वपूर्ण बताया। गिरमिटिया देशों के अप्रवासी साहित्य में समालोचकों में डॉ. विमलेश कान्ति वर्मा और स्व. कमल किशोर गोयनका का नाम भी आता है।
डॉ. ऋषि कुमार मणि त्रिपाठी ने प्रवासी साहित्य की चर्चा करते हुए शरद आलोक की कहानियों के बारे में कहा कि उनकी कहानियां तत्काल हुई घटनाओं पर आधारित और समकालीन होती हैं। डॉ. बलबीर सिंह, दीक्षा गुप्ता, वन्दना, माया भारती आदि की उपस्थिति ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।
कार्यक्रम में रचनाकारों ने गोपालदास नीरज की सातवीं पुण्य तिथि पर याद किया और कुछ ने उनके गीतों को भी गुनगुनाया। प्रवासी साहित्य में रुचि रखने वालों के लिए यह कार्यक्रम बहुत महत्वूर्ण है। मधुर- रोचक कविताओं का भी आनंद कार्यक्रम के यूट्यूब चैनल से लिया जा सकता है।

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