इंदौर: देश में पत्रकारिता की स्थिति जितनी आज खराब है, उतनी इमरजेंसी के दौर में भी नहीं रही। सरकारी एजेंसियों को असहमति के स्वर दबाने के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। देश में 60 करोड़ से अधिक सोशल मीडिया के उपभोक्ता हैं, लेकिन उनके पास किसी पोस्ट की सच्चाई जानने या परखने का कोई जरिया नहीं है, जिसके कारण ’व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ देश के जनमानस को प्रभावित कर रही है।
यह बातें वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता तथा शिक्षक परंजाॅय गुहा ठाकुरता ने स्टेट प्रेस क्लब, म.प्र. द्वारा आयोजित ’लोकतंत्र में असहमति के स्वर’ विषय पर आयोजित संवाद कार्यक्रम में सारस्वत वक्ता के रूप में व्यक्त किए।
उन्होंने विस्तृत विवरण दिया कि किस तरह दिल्ली पुलिस के सैकड़ों कर्मचारियों ने न्यूज़ क्लिक वेबसाइट से जुड़े पत्रकारों को रात के ढाई-तीन बजे गिरफ्तार किया और उनके फोन, लैपटॉप इत्यादि भी जप्त किए गए। उनसे वे सवाल किए गए जिनसे पुलिस को कोई मतलब होना ही नहीं चाहिए। ज़्यादातर सवाल किसान आंदोलन के कवरेज, कोविड रोकथाम को लेकर किए गए सरकारी प्रयासों के कवरेज, पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू-मुस्लिम दंगे इत्यादि के कवरेज से संबंधित थे और बहुत से बेहद हास्यास्पद प्रश्न भी थे। क्या पुलिस यह तय करेगी की पत्रकार किस प्रकार का कवरेज करें ? असहमति के स्वर रोकने के लिए कानून और सरकारी एजेंसियों का इतना बुरी तरह से दुरुपयोग इमरजेंसी के समय भी नहीं हुआ। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि दैनिक भास्कर समाचार पत्र में कोविड काल में सरकारी विफलताओं के रिपोर्टर्स और फोटो प्रकाशित हुए तो तत्काल ही उसे समाचार-पत्र पर आयकर विभाग का छापा डलवाया गया। उन्होंने कहा कि सच्चे लोकतंत्र की रक्षा के लिए पत्रकारिता का स्वस्थ और स्वतंत्र रहना बेहद जरूरी है। लोकतंत्र और मीडिया दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं।
स्वतंत्र पत्रकारों पर उठने वाली उंगलियों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जब उन्होंने यूपीए के शासन में अंबानी को किया जा रहे समर्थन को जब उन्होंने रिपोर्ट किया और 2जी घोटाले पर जनहित याचिका लगाई तो भाजपायी नेता बड़े खुश हुए, लेकिन जब एनडीए के शासनकाल में अडानी उद्योग समूह को दी जा रही बेजा मदद को उन्होंने रिपोर्ट किया तो उन्हें कांग्रेसी करार दिया जाने लगा।
उल्लेखनीय है कि ठाकुरता देश के एकमात्र पत्रकार हैं जिनका उल्लेख हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट में दिया किया गया। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उन्होंने पिछले 9 वर्षों में एक भी पत्रकार वार्ता को संबोधित नहीं किया, लेकिन प्रसून जोशी, अक्षय कुमार जैसे लोगों को भी विशेष साक्षात्कार लेने के लिए आमंत्रित कर लिया।
ठाकुरता ने देश के मीडिया पर बढ़ते हुए सरकारी पैसे के प्रभाव को चिंताजनक बताया। साथ ही उन्होंने देश में बढ़ते सोशल मीडिया के एडिक्शन और सोशल मीडिया के नफरत और झूठे समाचार फैलाने के लिए होने वाले दुरुपयोग पर भी सवाल उठाए। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता में पेड न्यूज की स्थिति बहुत विकट हो चुकी है। इकोनामिक पॉलीटिकल वीकली में अडानी समूह को सरकारी मदद पर लिखे गए अपने आलेख, जिस पर उन्हें मानहानि के दावे झेलना पड़ रहे हैं, के विषय में उन्होंने कहा कि इसका एक-एक शब्द सत्य है और यह बात न्यायालय में साबित होगी। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस चुनाव में उनकी मदद करेगी जिनके पास संसाधन अधिक हैं।
विषय प्रवर्तन करते हुए प्रगतिशील लेखक संघ के विनीत तिवारी ने कहा कि लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए सहमति को हर कीमत पर दर्ज करने और उसके लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना होगा। लोकतंत्र के यज्ञ में आहुति देने वाले ठाकुरता एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं और प्रेरणा देते हैं।
संवाद कार्यक्रम के प्रारंभ में आयोजन की सहभागी संस्थान इप्टा की ओर से प्रमोद बागड़ी, भारतीय महिला फेडरेशन की ओर से सारिका श्रीवास्तव, प्रलेस की ओर से चुन्नीलाल वाधवानी एवं मेहनतकश की ओर से विजय दलाल ने स्वागत किया। इस अवसर पर वरिष्ठ अर्थशास्त्री जया मेहता का स्वागत स्टेट प्रेस क्लब, मध्य प्रदेश के अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने किया। अंत में मीना राणा शाह, रचना जौहरी एवं सोनाली यादव ने अतिथियों को स्मृति चिन्ह एवं स्टेट प्रेस क्लब, म.प्र. के प्रकाशन भेंट किये। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार एवं संस्कृति कर्मी आलोक वाजपेयी ने किया । अंत में आभार प्रदर्शन स्टेट प्रेस क्लब मप्र अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने किया।

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