September 14, 2026

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Chhatarpur Ganesh Mandir: हरिद्वार से छतरपुर लाई गई थी प्रतिमा, जानें मुगल काल से जुड़ा 300 साल पुराना इतिहास

छतरपुर। मध्य प्रदेश का छतरपुर जिला हमेशा से अपनी समृद्ध ऐतिहासिक धरोहरों, प्राचीन मान्यताओं और चंदेलकालीन इतिहास के लिए जाना जाता है।

गणेशोत्सव के पावन अवसर पर यहां के दो प्राचीन गणेश मंदिर विशेष रूप से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बने हुए हैं। इनमें से एक मंदिर का इतिहास मुगल शासनकाल से जुड़ा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां हुए दिव्य चमत्कार के कारण औरंगजेब की कट्टर सेना को बिना मूर्ति खंडित किए उल्टे पैर लौटने पर मजबूर होना पड़ा था।

⚔️ सन 1705 में हरिद्वार से चोरी-छिपे लाई गई थी प्रतिमा: तीन महीने की कठिन यात्रा के बाद छतरपुर में हुई स्थापना

शहर के महोबा रोड स्थित सिद्ध गणेश कॉलोनी में स्थित प्राचीन गणेश मंदिर भक्तों की अगाध आस्था का केंद्र है।

मंदिर के पुजारी लखनपुरी गोस्वामी बताते हैं कि सन 1705 में जब देश पर मुगलों का शासन था, तब हिंदू देवी-देवताओं के मंदिरों और मूर्तियों को लगातार निशाना बनाकर खंडित किया जा रहा था। उस दौर में मुगल आक्रांताओं से बचाकर भगवान गणेश की इस अति-प्राचीन मूर्ति को हरिद्वार से लाया गया था। प्रतिमा को सफेद कपड़े में लपेटकर, एक हाथी और चार बैलगाड़ियों के सहारे तीन महीने की अत्यंत कठिन और दुर्गम रास्तों की यात्रा पूरी कर सुरक्षित छतरपुर लाया गया था।

🏛️ औरंगजेब के सैनिकों का हमला और दिखा दिव्य चमत्कार: नाम पड़ा ‘सिद्ध गणेश मंदिर’

पुजारी लखनपुरी के अनुसार, जैसे ही मंदिर में मूर्ति स्थापना की तैयारियां शुरू हुईं, औरंगजेब के सैनिकों को इसकी भनक लग गई।

मुगल सैनिकों ने मंदिर परिसर में धावा बोलकर तोड़फोड़ की और कुएं के पास रखी कुछ अन्य मूर्तियों को खंडित कर दिया, जिनके ऐतिहासिक साक्ष्य आज भी मंदिर परिसर में मौजूद हैं। हालांकि, जब सैनिक मुख्य प्रतिमा को खंडित करने पहुंचे, तो वहां ऐसा अदभुत चमत्कार हुआ कि सेना भयभीत होकर बिना नुकसान पहुंचाए उल्टे पैर वापस लौट गई। इस अलौकिक घटना के बाद से ही इस पावन स्थल का नाम ‘सिद्ध गणेश मंदिर’ के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

🏹 खजुराहो के 1000 साल पुराने ‘रणविजय गणपति’: चंदेल राजा युद्ध पर जाने से पूर्व लेते थे आशीर्वाद

वहीं, छतरपुर जिले का दूसरा ऐतिहासिक गणेश मंदिर खजुराहो स्थित विश्व प्रसिद्ध मतंगेश्वर मंदिर परिसर में विराजमान है। लगभग 1,000 वर्ष पुराना यह चंदेलकालीन मंदिर अत्यंत दुर्लभ माना जाता है।

मान्यता है कि चंदेल वंश के राजा किसी भी युद्ध या महत्वपूर्ण सैन्य अभियान पर जाने से पूर्व यहां भगवान गणेश के दर्शन और विधिवत पूजन करते थे। श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि इन ‘रणविजय गणपति’ की पूजा अर्चना करके युद्धभूमि में जाने वाले राजा हमेशा विजयश्री प्राप्त करके लौटते थे। एक ही विशाल पत्थर पर उकेरी गई यह दुर्लभ प्रतिमा आज भी मंदिर के प्रांगण में स्थापित है।

🎨 मथुरा के 1600 कलाकारों ने गढ़ी थी यह दुर्लभ प्रतिमा: इतिहासकारों और पंडितों ने बताया महात्म्य

इतिहासकार और सेवानिवृत्त प्रोफेसर एन. के. जैन बताते हैं कि खजुराहो में चंदेल काल के दौरान कुल 85 मंदिरों का निर्माण कराया गया था, जिन्हें मथुरा से आए लगभग 1,600 कुशल शिल्पकारों और कलाकारों ने तराशा था।

उसी दौर की यह एक-शिला निर्मित गणेश प्रतिमा अद्वितीय स्थापत्य कला का नमूना है। पंडित सौरभ तिवारी बताते हैं कि गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर इन दोनों सिद्ध पीठों पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं। माना जाता है कि यहां सच्चे मन से लड्डू अर्पित करने मात्र से ही जीवन के समस्त विघ्न दूर हो जाते हैं।

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