September 25, 2026

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MP Farmers Advisory: अलनीनो के दौर में गेहूं-धान की जगह लगाएं सरसों व तिलहन; छिंदवाड़ा कृषि अनुसंधान केंद्र की सलाह

छिंदवाड़ा। अलनीनो प्रभाव के चलते मध्य प्रदेश के कई जिलों में इस वर्ष सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है। बारिश की इस अनिश्चितता का सीधा असर किसानों की मुख्य फसल मक्के पर पड़ा है, जिससे उत्पादन में गिरावट और फसलों के नुकसान की खबरें आ रही हैं। इसके साथ ही अब आगामी रबी सीजन की फसलों की बुवाई को लेकर भी किसानों की चिंताएं बढ़ गई हैं। हालांकि, कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि सही समय पर सावधानी बरतने और कम पानी की आवश्यकता वाली सही फसलों का चयन करने से किसान इस संभावित घाटे से बच सकते हैं।

🔬 राष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिकों ने किया छिंदवाड़ा का दौरा: मक्के की फसल की हुई गहन मॉनिटरिंग

छिंदवाड़ा स्थित ‘आंचलिक कृषि अनुसंधान केंद्र’ में मक्के की फसल की वर्तमान स्थिति और अनुसंधान का जायजा लेने के लिए देश के प्रमुख कृषि वैज्ञानिक पहुंचे।

केंद्र की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. गौरव महाजन ने बताया कि किसी भी अनुसंधान केंद्र में फसलों पर चल रहे शोध की निगरानी राष्ट्रीय स्तर पर की जाती है। इसी कड़ी में डॉ. तोषकर (आईएमआर लुधियाना), डॉ. नरेंद्र सिंह (हरियाणा) और डॉ. केतन प्रजापति (गोधरा) छिंदवाड़ा पहुंचे। वैज्ञानिकों की टीम ने यहाँ मक्के की फसल पर अलनीनो के प्रभाव की विस्तृत समीक्षा की। उल्लेखनीय है कि छिंदवाड़ा मध्य प्रदेश का एकमात्र ऐसा केंद्र है जहाँ वर्ष 1962 से लगातार मक्के की उन्नत किस्मों पर शोध किया जा रहा है।

💡 अलनीनो के असर से फसल को कैसे बचाएं: कृषि वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र सिंह के उपयोगी सुझाव

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (हिसार) के कृषि वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र सिंह ने बताया कि अलनीनो के प्रभाव से खरीफ की फसलें प्रभावित हुई हैं।

बारिश का पैटर्न बिगड़ने और कम वर्षा होने के कारण मक्के के भुट्टों में दानों का विकास ठीक से नहीं हो पाया है। ऐसी विपरीत परिस्थितियों से निपटने के लिए किसानों को कम समय में पकने वाली (कम उम्र की) किस्मों की बुवाई करनी चाहिए ताकि उन्हें पानी की किल्लत से न जूझना पड़े।

🌻 रबी सीजन में गेहूं-धान के बजाय लगाएं सरसों और तिलहन: कम पानी में मिलेगी बंपर उपज

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अलनीनो का प्रभाव आगामी रबी सीजन में भी साफ तौर पर दिखाई देगा, जिससे मुख्य रूप से गेहूं और धान जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलें लगाने वाले किसानों को भारी परेशानी हो सकती है।

  • सरसों की खेती: रबी सीजन में किसानों को गेहूं के बजाय सरसों की बुवाई को प्राथमिकता देनी चाहिए। सरसों में केवल एक बार ही सिंचाई की आवश्यकता होती है और बाजार में इसके बेहतर दाम भी मिलते हैं।
  • तिलहनी फसलें: इसके अलावा किसान कम पानी में तैयार होने वाली अन्य तिलहनी फसलें जैसे सूरजमुखी, अलसी और जगनी (रामतिल) की खेती भी कर सकते हैं।
🚜 जलवायु परिवर्तन के दौर में बदलें खेती का तरीका: खेती को लाभ का धंधा बनाने की पहल

कृषि वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र सिंह ने स्पष्ट किया कि आने वाला समय जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के दृष्टिकोण से चुनौतीपूर्ण रहने वाला है।

ऐसे दौर में धान और गेहूं जैसी ज्यादा पानी की खपत वाली पारंपरिक फसलें लगाना किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है। कम अवधि में पकने वाली किस्मों और तिलहनी फसलों को अपनाकर किसान अपनी लागत घटा सकते हैं और जल संकट के बावजूद बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर मॉनिटरिंग का उद्देश्य भी यही है कि अनुसंधान का सीधा लाभ खेत-खलिहानों तक पहुंचे और किसानों को उच्च गुणवत्ता वाली किस्में उपलब्ध कराई जा सकें।

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