नरसिंहपुर। जिला मुख्यालय स्थित श्री गणेश देवस्थानम् अपनी पौराणिक मान्यताओं, अलौकिक चमत्कारों और लगभग 250 साल पुराने समृद्ध इतिहास के कारण पूरे प्रदेश और देश में सनातन आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। प्राकृतिक हरियाली और खेत-खलिहानों के बीच स्थित होने के कारण स्थानीय लोग इसे बेहद श्रद्धा के साथ ‘शक्ति वाले बगीचा’ के नाम से भी पुकारते हैं।
मान्यता है कि यहां जो भी भक्त सच्चे मन से अपनी मनोकामना लेकर आता है, प्रथम पूज्य श्री गणेश उनकी झोली जरूर भरते हैं। यही वजह है कि माघ माह की तिल चतुर्थी पर यहां विशाल मेले का आयोजन होता है, साथ ही महाशिवरात्रि और आम दिनों में भी देश भर से श्रद्धालु इस ‘मन्नतपूर्ति के द्वार’ पर माथा टेकने पहुंचते हैं।
🐘 दायीं सूंड की अत्यंत दुर्लभ प्रतिमा और वटवृक्ष का अलौकिक चमत्कार: बरगद के तने पर उभरी एकदंत की आकृति
देशभर के मंदिरों में स्थापित अधिकांश गणेश प्रतिमाओं की सूंड बायीं ओर होती है, लेकिन किसानी वार्ड स्थित इस सिद्ध शक्तिपीठ की सबसे बड़ी खासियत यहां विराजित दायींवर्ती (दायीं सूंड वाली) प्रतिमा है। सफेद संगमरमर से निर्मित पूर्व मुखी यह प्रतिमा अत्यंत दुर्लभ, शांत, मनोहारी और तुरंत फल देने वाली मानी जाती है।
इसके साथ ही देवस्थानम् परिसर में स्थित लगभग ढाई सौ साल पुराने विशालकाय वटवृक्ष (बरगद) के तने पर प्राकृतिक रूप से उभरी एकदंत श्री गणेश की आकृति हर दर्शनार्थी को अचरज में डाल देती है। यहाँ प्रतिमा पर सिंदूर और चोला अर्पित करने का विशेष महत्व है, जिससे श्रद्धालुओं के बड़े से बड़े विघ्न दूर हो जाते हैं।
📜 सन 1781 का ऐतिहासिक घटनाक्रम: जब ‘विघ्नहर्ता’ ने स्वप्न में संदेश देकर बदलवाया अपना धाम
इतिहास और जनश्रुतियों के अनुसार, सन 1781 में नरसिंहपुर के एक जाट सरदार ने क्षेत्र में एक विशाल भव्य मंदिर का निर्माण कार्य शुरू कराया था। पुरातन योजना के अनुसार, जाट सरदार द्वारा बनाए जा रहे मंदिर को तीन हिस्सों में बांटा गया था—मध्य में नरसिंह भगवान, दाहिने भाग में भगवान शिव और बायीं ओर श्री गणेश जी की प्रतिमा स्थापित की जानी थी।
निर्माण कार्य पूरा होने तक गणेश प्रतिमा को पास के कार्यशाली बगीचे में एक छोटे मंदिर में रखवाया गया था। जब मूल मंदिर बनकर तैयार हुआ और सरदार प्रतिमा को वहां ले जाने लगे, तब श्री गणेश ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर बगीचे वाले स्थान को न छोड़ने का निर्देश दिया। सरदार ने इसे ईश्वर की इच्छा मानकर अपना निर्णय बदल दिया और प्रतिमा वहीं स्थापित रहने दी।
🪔 पुरोहित परिवार द्वारा कराया गया भव्य जीर्णोद्धार: 1997 से पीढ़ी-दर-पीढ़ी जारी है सेवा
लंबी अवधि तक लघु स्वरूप में पूजा-अर्चना के बाद, 1990 के दशक में इस पावन स्थल को विशाल और भव्य रूप देने का संकल्प स्वर्गीय पंडित कृष्णकुमार पुरोहित ने लिया। लगभग 127 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद, माघ चतुर्थी (27 जनवरी 1997) को आयोजित भव्य धार्मिक अनुष्ठान के साथ मंदिर का नया और विशाल स्वरूप श्रद्धालुओं के सामने आया।
वर्तमान में स्वर्गीय पंडित कृष्णकुमार पुरोहित के सुपुत्र पंडित सुशांत पुरोहित और पंडित शैलेष पुरोहित स्थानीय धर्मप्रेमी जनता के सहयोग से मंदिर का बेहतर संचालन, सौंदर्यीकरण और धार्मिक परंपराओं का निर्वहन पूरी निष्ठा के साथ कर रहे हैं।

More Stories
Ganesh Trunk Direction Meaning: घर में ला रहे हैं बप्पा? जानें दाईं और बाईं सूंड वाले गणेश जी का रहस्य व नियम
Mahakal Nagri Ujjain Events: बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद पहली बार उज्जैन पहुंचेंगे नितिन नबीन, सुरक्षा अलर्ट
Seva Sankalp Abhiyan Guidelines: महाकाल लोक से लेकर हर पंचायत तक दीपोत्सव, जानें मध्य प्रदेश सरकार का पूरा प्लान