सामान्यत: जीवन में पाप और पुण्य दोनों होते हैं। हिन्दू मान्यता के अनुसार पुण्य का फल स्वर्ग और पाप का फल नर्क होता है। नर्क में जीवात्मा को बहुत यातनाएं भोगनी पड़ती हैं।
पुण्यात्मा मनुष्य योनि तथा देवयोनि को प्राप्त करती है। इन योनियों के बीच एक योनि और होती है वह है प्रेत योनि। वायु रूप में यह जीवात्मा मनुष्य का मन:शरीर है, जो अपने मोह या द्वेष के कारण इस पृथ्वी पर रहता है। पितृ योनि प्रेत योनि से ऊपर है तथा पितृलोक में रहती है।
भाद्रपद की पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक सोलह दिनों तक का समय सोलह श्राद्ध या श्राद्ध पक्ष कहलाता है। शास्त्रों में देवकार्यों से पूर्व पितृ कार्य करने का निर्देश दिया गया है। श्राद्ध से केवल पितृ ही तृप्त नहीं होते अपितु समस्त देवों से लेकर वनस्पतियां तक तृप्त होती हैं।
श्राद्ध करने वाले का सांसारिक जीवन सुखमय बनता है तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस बार पितृपक्ष का समय 2 सितंबर से शुरु होकर 17 सितंबर तक रहेगा। इस समय पितरों का तर्पण करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है, और मोक्ष प्राप्त होता है।
पितृ- श्राद्ध- आरम्भ
- पुर्णिमा श्राद्ध-2/9/20 बुधवार
- प्रतिपदा श्राद्ध-3/9/20गुरुवार
- द्वितीया श्राद्ध-4/9/20शुक्रवार
- तृतीया श्राद्ध-5/9/20शनिवार
- चतुर्थी श्राद्ध-6/9/20रविवार
- पंचमी श्राद्ध-7/9/20सोमवार
- षष्ठी श्राद्ध- 8/9/20मंगलवार
- सप्तमी श्राद्ध -9/9/20बुधवार
- अष्टमी श्राद्ध-10/9/20गुरुवार
- नवमीश्राद्ध-11/9/20शुक्रवा
- दशमी श्राद्ध-12/9/20शनि
- एकादशी-13/9/20रविवार
- द्वादशीश्राद्ध-14/9/20सोम
- त्रयोदशीश्राद्ध-15/9/29मङ्ग
- चतुर्दशीश्राद्ध-16/9/20बुध
- सर्वपितृअमावस्या श्राद्ध-17/9/20गुरुवार. पं. योगेश द्विवेदी श्री साधना ज्योतिष केंद्र उज्जैन(म.प्र.) मोबाइल- 98277-14275

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