आज फिर बूंदे भिगोने मुझे आई हैं
हर बूंद कुछ याद अपने साथ लाई है
कुछ कहती है, कुछ खामोश रहती है
वो दुल्हन की तरह यादों का घूंघट ओढ़ आई है
बादलों का पहरा तोड़ वो मुझसे मिलने आई है
न जाने कितने मीलों का सफर तय कर आज आई है
भिगोती मुझे है और टूट वो जाती है
हर एक बूंद मुझसे ही लिपट जाती है
शोर करती है वो बच्चों सा, मचल वो पगली जाती है
माटी में मिल वो नश्वरता का सन्देश दे जाती है
उसके आते ही मन मेरा मचल जाता है
और रसोई का हर कोना पकौड़ो से महक जाता है
वो अपने साथ कुछ बिछड़ों को भी ले आती है
और मेरी आँखों से भी कुछ बूंदे छलक जाती हैं।।
✒️ प्रो. वन्दना जोशी

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