मैं समय हूं आज मै तुम्हारे हाथ से निकलता जा रहा हूं। जब तक मैं तुम्हारे हाथों में था तब मुझे उम्मीद थी कि तुम मेरा प्रयोग इस धरा के कल्याण हेतु करोगे परन्तु मेरी इस सोच को हैं मानव!
तुम नित्य निरन्तर असत्य सिद्ध करते रहे और साथ ही साथ इसके प्रमाण भी प्रस्तुत करते रहे। कभी एटम बम बनाकर तो कभी इस धरा पर अपने वर्चस्व को स्थापित करने के उद्देश्य से मिसाइलें बनाकर, परन्तु तुम इतने में भी शान्त ना हुए तुमने परमाणु बम और रसायनिक बम तक बना डाले। तुम्हारा हित तुम्हे तुम्हारे ही अंतिम मार्ग तक ले जा रहा था काश, काश तुम यह देख पाते परन्तु तुम मेरी सिद्धि इस कार्य हेतु करना ही नहीं चाहते थे।
तुम्हारे स्वार्थ की सीमा तुमने इतनी लांघ दी कि तुम अपने पेट की ज्वाला को शांत कर लेने भर के लिए निरपराधी मूक जीव को अपनी भोजन की थाली तक में लेकर आ गए। मेने तुम्हे इस धरा का आधिपत्य दिया था परंतु है मूर्ख मानव! तुमने तो आकाश और फिर इस अंतरिक्ष तक को अपना शिकार बना लिया। जिसे तुम अपना विकास बता कर दंभ भर रहे थे वास्तव में वो केवल तुम्हारा विनाश था जिसका स्वयं तुम आलिंगन करने हेतु उत्सुक थे।
अब जब मैं (समय) तुम्हे तुम्हारे किये गए अपराधों के दर्शन मात्र करवा कर इस पृथ्वी के साथ न्याय करना चाहता हूं तो तुम मुझे ही पकड़कर कैद करना चाहते हो। है मानव! मैं जानता हूँ कि तुम परमात्मा की वो अनोखी कृति हो जिसे परमात्मा ने स्वयं ने जगत में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्रदान किया है और मैं जानता हूं कि तुम इस परिस्थितियों (कोरोना) में भी मुझे अपने अनुकूल बना ही लोगे।
पर यह अमिट सत्य है कि समय से परे वह परमात्मा है जो तुम्हारा मेरा हम सब का परमपिता है। वो अभी मात्र तुम्हे एक चेतावनी देकर तुम्हे समझाना चाहता है। मेरा अनुरोध स्वीकार कर उस चेतावनी को समझ लो अन्यथा उस पिता के कठोर दण्ड से मैं अथार्त समय तुम्हें फिर नहीं बचा सकेगा।
प्रो. वन्दना जोशी

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