गोरखपुर के गुलहरिया के रहने वाले शैलेंद्र की 10 साल की बिटिया लक्ष्मी अपनी पूरी ताकत से सांसों को बटोर रही थी, लेकिन प्रयास नाकाफी साबित हो रहे थे। बीआरडी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बेड उपलब्ध नहीं थे और ऑक्सीजन की कमी बच्चों की जिंदगी की डोर को मौत की तरफ खींच रही थी। इंसेफेलाइटिस और जापानी बुखार से पीड़ित लोगों के लिए ऑक्सीजन ही जीवन है। लक्ष्मी को सांस लेने में परेशानी हो रही थी। डॉक्टरों ने शैलेंद्र को हाथ से पंप करके लक्ष्मी को ऑक्सीजन देने के लिए कहा कि शैलेंद्र जनरल वार्ड के फर्श पर पूरी तेजी से पंप करने लगे ताकि उनकी बिटिया की सांसों की डोर चलती रहे।
शैलेंद्र बताते हैं कि 8 तारीख को ही 2 मासूमों के सांसों की डोर टूट गई। इनकी खाली हुई सीटों में से एक लक्ष्मी को मिली और उसे आईसीयू में ले जाया गया। अगले दिन यानी 9 तारीख तक लक्ष्मी का इलाज चलता रहा। 10 तारीख को बीआरडी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने बताया कि लक्ष्मी की हालत बिगड़ती जा रही है। शैलेंद्र ने उसे बचाने के लिए डॉक्टरों से मिन्नतें कीं। ईश्वर से दुआएं की, लेकिन कुछ भी काम न आया। दोपहर का वक्त था, डॉक्टर आए और शैलेंद्र से कहा कि लक्ष्मी को घर ले जाइए, उसे बचा पाना बहुत मुश्किल है।
गोरखपुर: बिटिया को बचाने के लिए पिता करता रहा प्रयास

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