May 20, 2026

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अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठी एवं कृष्ण बसंती अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड समारोह संपन्न

उज्जैन: प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका अक्षरवार्ता, कृष्ण बसंती शैक्षणिक एवं सामाजिक जनकल्याण समिति एवं राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के सहयोग से वाग्देवी भवन में आयोजित शोध संगोष्ठी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के परिप्रेक्ष्य: शिक्षा, साहित्य और संस्कृति पर एकाग्र थी, जिसमें देश-विदेश के विशेषज्ञ गण ने भाग लिया।

अध्यक्षता सम्राट् विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन के प्रभारी कुलगुरु प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा ने की। सारस्वत अतिथि महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलगुरु प्रो. शिवशंकर मिश्र, विश्वविद्यालय के कार्यपरिषद सदस्य राजेश सिंह कुशवाह, वरिष्ठ साहित्यकार हरेराम वाजपेयी, इंदौर ने विचार व्यक्त किए। समारोह में दो पुस्तकों जयश्री उपाध्याय, बड़वाह के ललित निबन्ध संग्रह एवं डॉ मोहन बैरागी के कहानी संग्रह ढाई आखर की खोज का लोकार्पण अतिथियों द्वारा किया गया।

अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठी एवं कृष्ण बसन्ती अंतरराष्ट्रीय अवार्ड समारोह के मुख्य अतिथि वाल्मीकि धाम पीठाधीश्वर, संसद सदस्य, राज्यसभा एवं राष्ट्रीय सन्त बालयोगी पूज्यश्री उमेशनाथ जी महाराज ने कहा कि वर्तमान युग में अध्यात्म और तकनीक के बीच सेतु बनाने की आवश्यकता है। हमें कृत्रिम बुद्धि (एआई) से असली बुद्धि अर्थात आत्मज्ञान की ओर बढ़ना चाहिए। उन्होंने वाल्मीकि, गुरु गोरखनाथ और स्वामी विवेकानंद के दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि जब हम अपनी समृद्ध गुरु-परंपरा और मर्यादाओं को साथ लेकर चलेंगे, तभी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त हो सकेंगे।

अध्यक्षता करते हुए प्रभारी कुलगुरु प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि एआई टूल्स शिक्षा, संस्कृति, साहित्य सहित हमारे जीवन से जुड़े प्रत्येक पक्ष पर अपनी छाप छोड़ रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सामान्य प्रौद्योगिकी से अलग है जो पहले से निर्धारित काम करती है और अपनी सीमाओं रहते हुए पहले से दिए गए प्रोग्रामिंग के आधार पर परिणाम देती है। एआई की दिशा अलग है। मानव मस्तिष्क कैसे सोचता है, समस्या को हल करते समय कैसे सीखता, निर्णय लेता है और कैसे काम करता, यह इस तरह कार्य करती है। लोगों को बेहतर सुख-सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिये यह तकनीक काम में आ रही है। हमें इससे जुड़ी चुनौतियों और सम्भावनाओं को लेकर सजग रहना होगा।

महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो शिवशंकर मिश्र ने प्राचीन शास्त्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि रामायण और रामचरितमानस में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उदाहरण मिलते हैं। यह केवल ‘काया परिवर्तन’ तक सीमित नहीं है, बल्कि वाणी का भी परिवर्तन किया जा सकता है। यंत्र-तंत्र के शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है। उन्होंने बल दिया कि मनुष्य को तकनीक के प्रयोग के समय अपने विवेक का त्याग नहीं करना चाहिए।

विशिष्ट अतिथि कार्यपरिषद सदस्य राजेश सिंह कुशवाह ने कहा कि एआई का निर्माता स्वयं मनुष्य है। उन्होंने चेतावनी दी कि तकनीक का आविष्कार किसी न किसी उद्देश्य से होता है, लेकिन वर्तमान में इसके दुष्प्रचार का खतरा बढ़ रहा है। हमें इसके उद्देश्य को समझे बिना इसका अंधानुकरण नहीं करना चाहिए।

संस्था परिचय और स्वागत भाषण कृष्ण बसंती शैक्षणिक एवं सामाजिक जनकल्याण समिति के संस्थापक अध्यक्ष डॉ मोहन बैरागी ने दिया। डॉ. बैरागी ने अपने कहानी संग्रह ढाई आखर की खोज की रचना प्रक्रिया पर विचार साझा किए। प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा, डॉ राजेश रावल और शिशिर उपाध्याय ने ‘ललित गंध’ के निबंधों की व्यापक समीक्षा प्रस्तुत की। संगोष्ठी के तकनीकी सत्रों में फिलाडेल्फिया, यूएसए से डॉक्टर मीरा सिंह, मॉरीशस से डॉक्टर सोमदत्त काशीनाथ, नीदरलैंड्स से डॉ ऋतु नन्नन पांडे, डॉ. प्रीति सिंह, इंदौर, ओस्लो नॉर्वे से श्री सुरेश चंद्र शुक्ल, प्रो उर्मि शर्मा, शिशिर उपाध्याय, बड़वाह, डॉ शहनाज शेख, नांदेड़, प्रो. डी.डी. बेदिया, डॉ उपेंद्र भार्गव, डॉ. शेखर दिसावल आदि सहित अनेक विद्वानों ने विचार व्यक्त किए।

डॉ. हरेराम वाजपेयी, इंदौर ने विज्ञान और परंपरा के संबंध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमारी परंपराओं पर विज्ञान कभी हावी नहीं हो सकता। ज्ञान से बढ़कर विज्ञान नहीं है। जो भाषा और संस्कृति को छोड़ देता है, वह सब कुछ खो देता है।

अतिथि स्वागत समन्वयक प्रो जगदीश चंद्र शर्मा एवं डॉ मोहन बैरागी, संयोजक डॉ ओ.पी. वैष्णव, डॉ भेरुलाल मालवीय, शाजापुर, आराध्य बैरागी आदि ने किया। प्रारंभ में अतिथियों द्वारा वाग्देवी और स्व. डॉ प्रभु चौधरी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई।

समारोह में देश के दस से अधिक राज्यों के शिक्षाविद, प्राध्यापक, संस्कृतिकर्मी एवं शोधकर्ताओं को अतिथियों द्वारा कृष्ण बसन्ती अंतरराष्ट्रीय अवार्ड 2026 से सम्मानित किया गया। इनमें डॉ प्रीति चौबीसा, डूंगरपुर, भगवान सहज निंबाहेड़ा, डॉ मनीषा गुप्ता, भोपाल, डॉ नवीन कुमार जोशी, भरतपुर, डॉ ज्ञानेश्वरी व्यास, भोपाल, कोमल उज्जवल, जयपुर, डॉ रजनीकांत कुमार, नैनीताल, डॉ प्रीति सिंह इंदौर, डॉ अशोक मुरलीधर घोरपड़े, अहमदनगर, महाराष्ट्र, बबीता यादव, दिल्ली, दिग्विजय द्विवेदी, उज्जैन, उपासना गुप्ता, जितेंद्र प्रभु चौधरी, रजिया शेख, नांदेड़, डॉ शहनाज शेख, पूजा परमार, शिवानी चौहान, अर्पिता आंजना आदि सम्मिलित थे। लोक गायक सुंदरलाल मालवीय, स्नेहा गेहलोत, शरद गेहलोत, नारायणी माया बधेका और निशा पंडित ने गीतों की प्रस्तुति दी। मुकेश जोशी, निदेशक प्रेमचंद सृजन पीठ, फिल्म समीक्षक शशांक दुबे, कवि दिनेश दिग्गज, संतोष सुपेकर, कवयित्री निशा पंडित, सीमा जोशी, अक्षय चवरे, प्रणव शर्मा, मनीष पाटीदार आदि सहित अनेक संस्कृति कर्मी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का संचालन पूजा परमार ने किया और आभार प्रदर्शन प्रो. जगदीशचंद्र शर्मा और डॉ ओ.पी. वैष्णव ने किया।

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