उज्जैन। विजयादशमी के पावन पर्व पर रावण दहन की सदियों पुरानी परंपरा को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। अखिल भारतीय पुजारी महासंघ ने इस प्रथा पर सवाल उठाते हुए दावा किया है कि आश्विन शुक्ल दशमी तिथि को रावण दहन किए जाने का कोई स्पष्ट शास्त्रीय प्रमाण नहीं मिलता है। महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेश शर्मा का कहना है कि पौराणिक ग्रंथों के अनुसार रावण का वध चैत्र कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था, इसलिए सनातन मान्यताओं के विरुद्ध रावण दहन करने की इस परंपरा की शास्त्रीय व्याख्या होनी चाहिए।
📜 पुजारी ने मांगे प्रमाण तो इतिहासकार डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित ने बताया विजयादशमी का ऐतिहासिक अर्थ
पुजारी महेश शर्मा ने वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस का हवाला देते हुए चुनौती दी है कि यदि इस तिथि पर रावण दहन का कोई पुख्ता प्रमाण है तो उसे सामने रखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि रावण को केवल एक अत्याचारी राजा के रूप में देखना उसके प्रकांड विद्वान और ब्राह्मण होने के पक्ष की अनदेखी करना है। दूसरी ओर, इस बहस के बीच पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध साहित्यकार एवं इतिहासकार डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित ने विजयादशमी के मूल सांस्कृतिक महत्व को स्पष्ट करते हुए बताया कि नवरात्र के बाद दशमी का दिन विजय की तैयारी, संकल्प और शक्ति की आराधना का प्रतीक है। प्राचीन काल में इसी दिन राजाओं द्वारा अपनी विजय यात्रा की शुरुआत की जाती थी।

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