सोचिए, आपके पास ऐसी घड़ी हो जो अरबों साल तक चलने के बाद भी सिर्फ 1 सेकंड तक का फर्क करे. सुनने में यह भले ही अजीब लगे, लेकिन वैज्ञानिक ऐसी घड़ी बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. सिंगापुर ने भी इस तकनीक में बड़ी उपलब्धि हासिल की है. वहां वैज्ञानिकों ने बेहद सटीक एटॉमिक क्लॉक तैयार की है. यह सामान्य घड़ी की तरह सिर्फ घंटे और मिनट नहीं बताती, बल्कि समय को बेहद बारीकी से मापती है.
यह उपलब्धि इसलिए खास है क्योंकि ऐसी घड़ियां बनाने की तकनीक पर अमेरिका, चीन और यूरोप जैसे देशों में भी काम हो रहा है. सिंगापुर की नई घड़ी इतनी सटीक है कि इसमें समय की बहुत छोटी गलती भी पकड़ में आ सकती है. इसका इस्तेमाल भविष्य में GPS, अंतरिक्ष विज्ञान, नेविगेशन और कई वैज्ञानिक प्रयोगों में किया जा सकता है. इस मामले में सिंगापुर ने चीन और अमेरिका के वैज्ञानिकों को पीछे छोड़ दिया है.
आखिर एटॉमिक क्लॉक क्या होती है?
इसे आसान भाषा में समझें तो एटॉमिक क्लॉक ऐसी घड़ी है जो परमाणु के बहुत छोटे बदलाव को देखकर समय मापती है. हमारी सामान्य घड़ी में सुई या डिजिटल नंबर समय बताते हैं. लेकिन एटॉमिक क्लॉक में परमाणु को एक तरह के बेहद सटीक ‘टाइमर’ की तरह इस्तेमाल किया जाता है. सिंगापुर की घड़ी को ल्यूटेशियम (Lutetium) नाम की एक दुर्लभ धातु के सिर्फ एक परमाणु की मदद से बनाई गई है. इसकी सटीकता इतनी ज्यादा है कि अगर इसे लगातार 260 अरब साल तक चलाया जाए, तब जाकर इसमें सिर्फ 1 सेकंड की गलती होगी.
इतनी सटीक क्यों है ये घड़ी?
सामान्य घड़ी में समय की थोड़ी-बहुत गलती हो सकती है. लेकिन वैज्ञानिक प्रयोगों में सेकंड का बहुत छोटा हिस्सा भी मायने रखता है. सिंगापुर की इस घड़ी की सटीकता करीब 2.6 × 10⁻¹⁸ बताई गई है. आसान भाषा में इसका मतलब है कि अगर ऐसी घड़ी अरबों साल तक चले, तो उसके समय में करीब एक सेकंड का ही अंतर आ सकता है. यही वजह है कि इसे बेहद सटीक समय मापने वाली तकनीक माना जा रहा है.
कैसे काम करती है इतनी सटीक घड़ी?
आम घड़ियां समय मापने के लिए पेंडुलम या क्वार्ट्ज के कंपन का इस्तेमाल करती हैं. एटॉमिक क्लॉक इससे कहीं ज्यादा सटीक होती है. इसमें परमाणुओं के ऊर्जा स्तरों के बीच होने वाले बदलाव को बेहद स्थिर ‘टिक’ की तरह इस्तेमाल किया जाता है. सिंगापुर की टीम ने स्ट्रॉन्शियम (Strontium) परमाणुओं पर आधारित ऑप्टिकल क्लॉक विकसित की है. इसमें लेजर की मदद से परमाणुओं को नियंत्रित किया जाता है और उनके ऊर्जा बदलाव को मापा जाता है. ऑप्टिकल फ्रीक्वेंसी पर काम करने वाली ऐसी घड़ियां पारंपरिक सीजियम एटॉमिक क्लॉक की तुलना में कहीं ज्यादा तेज और सटीक ‘टिक’ देती हैं.
GPS और अंतरिक्ष में आएगी काम
आपके मोबाइल में Google Maps या कोई दूसरा नेविगेशन सिस्टम सही जगह दिखाता है. इसके पीछे सैटेलाइट और बेहद सटीक समय का बड़ा रोल होता है. समय की गणना में बहुत छोटी गलती भी दूरी और लोकेशन की गणना को प्रभावित कर सकती है. इसलिए ज्यादा सटीक एटॉमिक क्लॉक से GPS और दूसरे नेविगेशन सिस्टम को और बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है. अंतरिक्ष में भी इसका इस्तेमाल हो सकता है. वैज्ञानिक ऐसी घड़ियों की मदद से अंतरिक्ष यान की स्थिति और समय का ज्यादा सटीक हिसाब लगा सकते हैं.
अमेरिका और चीन के लिए चुनौती क्यों?
अमेरिका और चीन समेत दुनिया के कई देशों में बेहद सटीक एटॉमिक क्लॉक पर शोध चल रहा है. इन घड़ियों की होड़ सिर्फ समय बताने तक सीमित नहीं है. इनकी सटीकता वैज्ञानिक प्रयोगों, नेविगेशन और भविष्य की नई तकनीकों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है.
सिंगापुर की उपलब्धि इसलिए खास मानी जा रही है क्योंकि देश आकार में छोटा होने के बावजूद हाई-प्रिसीजन साइंस और मेट्रोलॉजी में अपनी क्षमता बढ़ा रहा है. नई घड़ी की सटीकता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही इस तकनीकी दौड़ में सिंगापुर को भी प्रमुख स्थान पर ला दिया है.

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