April 24, 2026

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बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने साबित किया बहुमत, विधानसभा में विश्वास मत प्रस्ताव पारित

पटना: बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने आज शुक्रवार को बिहार विधानसभा में विश्वास मत प्रस्ताव पेश किया, जो बहुमत से पारित हुआ। विश्वास मत प्रस्ताव ध्वनि मत से पास हो गया।

तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले विपक्ष ने वोटिंग की मांग नहीं रखी, जिससे सरकार ने आसानी से बहुमत साबित कर दिया। वैसे भी यह एक प्रक्रिया मात्र थी। राज्य की एनडीए सरकार के पास पूर्ण बहुमत है। गठबंधन के पास विधानसभा में कुल 201 सदस्य हैं।

सीएम सम्राट चौधरी के पास बीजेपी, जेडीयू, लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास, हम और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के 201 विधायकों का समर्थन है। 243 सीटों वाले बिहार विधानसभा में एनडीए के पास दो तिहाई बहुमत से भी ऊपर की संख्या है। फिलाहल, सदन में कुल 242 विधायक ही हैं क्योंकि बीजेपी विधायक नितिन नवीन जो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, उन्होंने राज्यसभा सांसद बनने के बाद विधानसभा से इस्तीफा दे दिया था। वे पटना की बांकीपुर सीट से विधायक थे।

हालांकि, सदन में विश्वासमत पेश और पारित कराने के बीच विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच टकराव भी देखने को मिला। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव और सम्राट चौधरी आमने सामने नजर आए। ‘इलेक्टेड सीएम’ और ‘सेलेक्टेड सीएम’ के मुद्दे पर वो हमलावर दिखे। उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव के दौरान ’25 से 30, फिर से नीतीश’ बोलकर बीजेपी ने अब नीतीश कुमार को फिनिश कर दिया है। साथ ही उन्होंने सम्राट चौधरी से कहा कि वो अपनी पगड़ी संभाल कर रखे क्योंकि उसपर विजय सिन्हा की नजर है।

नेता प्रतिपक्ष के आरोपों का उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि 25 से 30 तक नीतीश कुमार के ही मार्गदर्शन में सरकार चलेगी। इस बात में कोई दो राय नहीं है। 2020 में कम सीट आने के बाद भी बीजेपी ने जेडीयू के नेता नीतीश कुमार का सम्मान किया और उदारता से उनके नेतृत्व में सरकार बनाई।

उन्होंने कहा कि इस महीने नीतीश कुमार से सम्राट चौधरी को सहज सत्ता हस्तांतरण मिसाल बन गया है। यह एक ऐतिहासिक फैसला है। एनडीए के प्रति जनता का विश्वास अटूट है। बता दें कि NDA में शामिल सभी पार्टियों ने सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री और बिजेंद्र यादव व विजय चौधरी को उपमुख्यमंत्री बनने पर बधाई दी। विपक्ष के नेताओं ने तीखे सवाल उठाए।

हालांकि, अंत में उन्होंने मत विभाजन की मांग नहीं की, जिससे सरकार को राजनीतिक तौर पर सीधी बढ़त मिल गई। इस तरह बिहार में सम्राट चौधरी की सरकार की स्थिरता पर औपचारिक मुहर लग गई।

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