April 24, 2026

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देवारण्य योजना के तहत इंदौर में अश्वगंधा खेती को दिया जायेगा बढ़ावा- प्रशिक्षण कार्यशाला सम्पन्न

इंदौर: औषधीय खेती को बढ़ावा देने और किसानों की आय में वृद्धि के लिए राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड और मध्यप्रदेश राज्य औषधि पादप बोर्ड के तत्वावधान में आयुष विभाग जिला इंदौर द्वारा एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया।

कार्यशाला देवारण्य योजना के अंतर्गत “एक जिला एक औषधि उत्पाद -अश्वगंधा” पहल के तहत जनपद पंचायत महू में की गई। कार्यशाला में स्व-सहायता समूहों और किसानों को अश्वगंधा की वैज्ञानिक खेती, औषधीय महत्व और आर्थिक लाभों के बारे में प्रशिक्षित किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान धन्वंतरि जी के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलित कर किया गया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देना, किसानों को उनकी उपज का अधिकतम मूल्य दिलाना और उच्च गुणवत्ता वाली औषधि का उत्पादन करना था।

कार्यशाला का उद्घाटन मुख्य कार्यपालन अधिकारी पंकज दरोठिया सहित जनपद अध्यक्ष सरदार मालवीय, उपाध्यक्ष बीरबल डावर, महेश यादव , उद्यानिकी अधिकारी भगवतसिंह पवार द्वारा किया गया। इस अवसर पर आयुष विभाग की जिला आयुष अधिकारी डॉ. हंसा बारिया भी मौजूद थी।

जिला नोडल अधिकारी डॉ. शीतल कुमार सोलंकी ने बताया कि अश्वगंधा न केवल आयुर्वेद में एक शक्तिशाली रसायन है, बल्कि यह किसानों के लिए आर्थिक समृद्धि का द्वार भी खोल सकता है। इंदौर को अश्वगंधा उत्पादन का केंद्र बनाने की दिशा में यह प्रशिक्षण कार्यशाला एक महत्वपूर्ण कदम है। डॉ. सोनम तिवारी ने अश्वगंधा की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी, जलवायु एवं उन्नत किस्मों के बारे में बताया। डॉ. रागिनी शिवहरे ने बुवाई के लिए बीज की तैयारी पर विस्तार से प्रकाश डाला। डॉ. नेहा भाना द्वारा किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया गया। डॉ. प्रिया वर्मा ने फसल की कटाई का समय व कटाई पश्चात प्रबंधन व ग्रेडिंग के विषय में बताया। डॉ. सीमा आर्य ने फसलों के विपणन करने की जानकारी साझा की।

कार्यशाला का मुख्य आकर्षण अनुभवी किसानों का अपने अनुभवों को साझा करना। अश्वगंधा की खेती में नवाचार करने वाले किसान विष्णु पाटीदार ने अपनी सफलता की कहानियां सुनाते हुए कहा कि सही समय पर बुवाई, उचित सिंचाई और जैविक खाद का उपयोग करके मैंने प्रति एकड़ उच्च गुणवत्ता वाली उपज प्राप्त की और जिसे नीमच मंडी में अच्छे दामों पर बेचा। कार्यशाला में अनुभवी किसानों ने नए किसानों को सलाह दी कि वे मिट्टी की जांच समय पर करायें, फसलों की कटाई 150-180 दिन की अवधि में करें और बाजार की मांग को समझेंगे तो बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।

कार्यशाला में अश्वगंधा के चूर्ण, कैप्सूल और अन्य उत्पादों के उपयोग, साथ ही स्थानीय मंडियों नीमच, जोधपुर और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से बिक्री के अवसरों पर भी चर्चा हुई। इस आयोजन ने किसानों में अश्वगंधा खेती के प्रति उत्साह जगाया, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और मध्यप्रदेश को औषधीय पौधों के उत्पादन में अग्रणी बनाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। आयुष विभाग ने भविष्य में ऐसे और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई है ताकि अधिक से अधिक किसान इस पहल से जुड़ सकें।

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