“धुंधला अतीत आंसू के रूप में वाष्प बनकर उड़ रहा है मुस्कुराहट को उकेरते असीमित सपने और जिंदगी का ठिकाना नहीं दोनों के बीच सामंजस्य कर रहा है।”
यह आखिरी शब्द है जो फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह अपने इंस्टाग्राम पर छोड़ गए और छोड़ गए ऐसे अनगिनत सवाल जिनका जवाब उनकी ठंडी पड़ चुकी देह अब कभी नहीं देगी। सुशांत सिंह की मौत अभी जांच के घेरे में है जिसे आत्महत्या या हत्या कहना बेहद जल्दबाजी होगा।
इतनी जल्दी आत्महत्या कहना अभी इसलिए ठीक नहीं क्योंकि छोटे पर्दे से बड़े पर्दे तक अपना एक अलग मुकाम बनाने वाले व्यक्ति के पीछे सफलताओं के साथ अनगिनत असफलताएं भी जुड़ी होती हैं। इतनी असफलताओं का स्वाद चखने वाला व्यक्ति मौत का स्वाद चखना क्यों चाहेगा? यह बड़ा प्रश्न है। जिसका जवाब जब तक नहीं मिलता मौत को आत्महत्या कहना मेरे विचार से गलत होगा। इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि अवसाद इन सबके बीच छुप कर बैठा है।
जिसका सबूत इंस्टाग्राम की पोस्ट और डॉक्टरों की दवाइयां दे रही है। महज 34 साल की उम्र अवसाद के आगे बहुत छोटी है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि जिसको हम दोष देते हैं वह अवसाद हमें नहीं बल्कि उसे हम अपनाते हैं। सब कुछ जानने और समझने के बाद भी हम उसे अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं। दूसरों को खुश रहने , जिंदगी की परेशानियों से लड़ने, जीतने का संदेश देने वाला एक अभिनेता इस बात को क्यों नहीं समझ सका कि अवसाद के साथ कुश्ती लड़ते समय दाव बचने वाले नहीं बल्कि हराने वाले मारने पड़ते हैं।
अभिनेता हो या एक आम इंसान हर कोई अवसाद का शिकार है। यकीन ना हो तो एक स्कूल जाने वाले बच्चे से ही पूछो। पढ़ाई खेल स्कूल ट्यूशन के बीच वह किस तरह के अवसाद का शिकार है। और उसी अवसाद से बाहर आना है तो उसी बच्चे से इलाज पूछो। वह बताएगा इसका बेहतरीन इलाज। इलाज है एक दोस्त, एक शौक, एक डायरी और एक अच्छी किताब। अकेलापन ही अवसाद की ताकत है। यह दोस्तों के बीच नहीं आता, ये अपनों के बीच नहीं आता, गाना सुनते गुनगुनाते समय और किचन में खाना बनाते समय भी यह आपको परेशान नहीं करता। किताब को पढ़ते-पढ़ते नींद की दुनिया में चले जाने पर यह आपके पास नहीं फटकता।
पर इस अवसाद को पता है कि इन सब की तो हम इन सब की ही तो कमी है हमारी जिंदगी में। हम तो सोचते हैं अपनी असफलताओं के बारे में। भूल जाते हैं उस सफलता को जिसे देख दुनिया कभी हमसे जलती थी। हम सिर्फ देखते हैं अपने भविष्य को और भूल जाते हैं अतीत की वह स्वर्णिम स्मृतियां जो खुशियों से भरी थी। अवसाद इस सफलता असफलता और भविष्य की सोच में ही छुप कर बैठा है। एक बार इसे अपनी गिरफ्त में आजाद कर दो फिर देखना एक सुशांत अमिताभ की तरह जिंदगी की कठिनाइयों से लड़कर फिर कैमरे के सामने खड़ा दिखाई देगा।
✒️ प्रो. वंदना जोशी

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