सिद्धांतों की राजनीति अब पूरी तरह से समझौते की राजनीति बन चुकी है। कांग्रेस मुक्त भारत के अपने अभियान में भाजपा संघ के सिद्धांतों को नजरअंदाज करती नजर आ रही है। कुर्सी और सत्ता की चाह नेताओं में इतनी बढ़ गई है कि वे दल-बदल विरोधी कानून की भी धज्जियां उड़ाते नजर आ रहे हैं।
हालात तो ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाले दिख रहे हैं। सत्ता की चाह और पैसों की गर्मी सिद्धांतों को पूरी तरह से निगल चुकी है। चुनाव के बाद महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश या अब राजस्थान के हालातों पर नजर दौड़ाई जाए तो शायद मतदाता भी असमंजस में हैं कि उन्होंने वोट किस पार्टी के पक्ष में या विरोध में दिया था। इन राज्यों में एक ऐसी नई पार्टी (भाजपा+कांग्रेस) उभर कर सामने आ रही है, जिसका अस्तित्व कब तक का है यह तो शायद इसे बनाने वाले भी नहीं जानते।
मध्यप्रदेश में शिवराज महाराज के कितने दबाव में हैं, वह छुपाए नहीं छुप रहा। यह दबाव विभागों के बंटवारे में साफ नजर आ रहा है। महाराज जानते हैं कि शिव की सत्ता की चाबी अब पूरी तरह से उनके पास है और वे जिस दिशा में उसे घुमाना चाहें आसानी से घुमा सकते हैं। पर यह चाबी महाराज के हाथ कब तक रहेगी, यह आगामी उपचुनाव ही तय करेंगे। पर यह भी एक बड़ा सवाल है कि अपने मुख्यमंत्री बनने की मंशा जिसने पार्टी तक को छोड़ने पर मजबूर कर दिया, उसे सिंधिया कब तक दबा पाएंगे।
ऐसा न हो कि आने वाले समय में महाराज की यह मंशा शिव को उन्हीं के राज से बेदखल कर दे। दूसरी ओर दल बदल कर विधायक से मंत्री बने उन नेताओं की लंबी छलांग बरसों से भाजपा में एड़ी घिसने वाले नेताओं के गले की हड्डी बन गई है। जिसे वे न निगल पा रहे हैं और न उगल पा रहे हैं। ऐसे नेताओं ने भले ही अपने विद्रोह की चिंगारी को अभी तक दबा रखा है, पर जिस दिन यह चिंगारी ज्वाला बनेगी उस दिन शिवराज के राज को महाराज की छत्रछाया भी संभाल नहीं पाएगी।
✒️ प्रो.वन्दना जोशी

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