April 19, 2026

News Prawah

UDYAM-MP-49-0001253

मन…

आओ फिर से मन बना ले
मन को धो ले मन को बना ले
कर ले इसका मंथन विष को निकाल दे
कर अमृत का सृजन इसे निर्मल बना ले ।।

पाक कर दे आज इसे इतना
हर शख्स को यह अपना बना ले
दर्द और शिकवा इसमें ना रहे बाकी
हो जाए फिर हल्का इसे बचपन सा बना दे ।।

तोड़कर उलझनों की बेड़ियां
पंख नए इसे लगा दे
ना रहे कोई बोझ फिर इसमें
चलो फिर इसे नया सा बना दे।।

कोमल हो जाए आज ये इतना । आंसुओं से फिर इसे भिगो दे
सोने सा खरा बना इसे
गैरों को भी इसमें बसा ले ।।

सहनशील हो जाए ये इतना
इसे वसुंधरा सा बना ले
गगन को भी नाज हो इस पर
इसे इतना बड़ा बना ले।।

शिकवा, शिकायत ना गिला हो इसमें
प्रेम से इसको निखार ले
हो जाए आज फिर यह पावन
मन को मन चाहे जैसा बना ले ।।

प्रो. वन्दना जोशी
पत्रकारिता विभाग, जीएसीसी

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