April 24, 2026

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दुनिया में चीन की चुनौती

चीन का बढ़ता दबदबा दुनिया के लिए खतरा बन गया है। दुनिया के सामने चीन जैसी चुनौती और खतरे पेश कर रहा है वैसा कोई दुसरा देश नहीं। चीन अपने शांतिपूर्ण उदय का मुखौटा उतारकर शक्ति की राजनीति पर उतर आया है। चीन की आक्रामक और विस्तारवादी नीति से दुनिया के देशों में चीन के प्रति अविश्वास बढ़ा है।

ऐसे में चीन से के विरोधी और एक समान सोच रखने वाले देश चीन के खिलाफ मोर्चा खोल सकते है। जब से कोविड-19 की महामारी ने पुरी दुनिया को ऐतिहासिक संकट में डाला है। तब से चीन ने बड़ी ही चालाकी से इस बात को झुठलाने की कोशिश की है कि महामारी का संक्रमण चीन के वुहान से फैला है। यदि चीन ने प्रारम्भिक दिनों में ही सूचना को साझा कर दिया होता तो पूरी दुनिया खतरे में नहीं पड़ती।

चीन ने न केवल सूचनाओं को नियंत्रित किया बल्कि यदि किसी ने इसके फैलने की सूचना देकर चीन की ताकत को चुनौती दी तो उसे भी बेरहमी से कुचल दिया गया। ये सब भविष्य में चीन से उत्पन्न होने वाले खतरे के लक्षण मात्र है। चीन ने वायरस की उत्पत्ति और इससे जुड़े सही आंकड़े और जानकारी देने में भी आनाकानी की।

चीन ने कोराना से जुड़े जेनेटिक मेप, जिनोम की संरचना से जुड़े अहम तथ्यों को कई हफ्तों तक छुपा कर रखा। चीन के इस कुप्रबंधन और गैरजिम्मेदाराना व्यवहार ने न केवल पूरी दुनिया को संकट में डाला बल्कि पूरी दुनिया को घुटने पर ला दिया। वैश्विक अर्थव्यवस्था तहस नहस हो गयी। ऐसे में चीन ने मदद का मुखौटा पहन कर दुनिया के देशों में मेडिकल उपकरणों की सप्लाई की आड़ में एशिया, अफ्रिका, यूरोप के देशों में अपने आर्थिक बाजार ढ़ूंढता रहा।

चीन ने न केवल सूचना युद्ध छेड़ा बल्कि अपनी ‘मास्क डिप्लोमेसी’ के माध्यम से यूरोप में अपने मंसूबों को पूरा करने में लगा रहा। चीन ने यूरोपीय यूनियन में सेंध लगाने की भी कोशिश की। चीन इन देशों के भीतर की संवाद हिनता की कमजोरी और किसी भी संकट से निपटने की अपूर्ण तैयारी का नाजायज फायदा उठाते दिखा। यह सब अमेरिका द्वारा इस मौके पर नेतृत्व का प्रदर्शन न करने से चीन को मनमानी करने का मौका मिला।

यूरोपियन यूनियन को भविष्य में चीन के खतरे का सामना करना पड़ सकता है। कोविड-19 के संकट काल में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) पर चीन के केन्द्रित होने और उसकी चापलूसी करने का आरोप लगा है। इससे दुनिया के देशों की डब्ल्यूएचओ पर से विश्वसनियता घटी है। यहां तक कि डब्ल्यूएचओ की फैसले लेने वाली एक्जिक्यूटिव संस्था ‘वल्र्ड हेल्थ असेम्बली’ में चीन ने दबाव डालकर ताईवान को बाहर करवा दिया इससे ताईवान सदस्य नहीं बन सका।

कुछ महीने पूर्व ही चीन को सूरक्षा परिषद की अध्यक्षता मिलने के बाद चीनी राजदूत झांगजुंग ने ये स्पष्ट किया था कि चीन इस महामारी पर परिषद में जांच नहीं चाहता जो कि विश्व संस्था में चीन की मनमानी को दर्शाता है। यह महत्वपूर्ण बात है कि डब्ल्यूएचओ के 72 वर्ष के इतिहास में अमेरिका ही इसका सबसे बड़ा दानदाता रहा है। पिछली फंडींग में अमेरिका ने डब्ल्यूएचओ के कुल बजट का 15 प्रतिशत 893 मि. डाॅलर दान दिया।

जब कि चीन ने मात्र 86 मि. डाॅलर फिर भी इस पर चीन का प्रभाव ज्यादा दिखाई देता है। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र की 15 विशिष्ट ऐजेंसीयों में से 4 में चीन के राजनयिक प्रमुख है जबकि दुनिया की सुपर पाॅवर अमेरिका केवल एक एजेंसी का प्रमुख है। इसमें नीहित खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता है कि चीन डब्ल्यूएचओ की तरह बारी-बारी से अन्य एजेंसियों का भी दुरूपयोग नहीं करेगा।

यानी चीन की मनमानी और विस्तारवादी नीति से वैश्विक संस्थाओं के प्रभावित होने का खतरा भी बढ़ गया है। महामारी में पश्चिमी माॅडल के बुरी तरह फैल होने पर चीन ने इसे दुनिया के सामने लोकतांत्रिक माॅडल के फेल होने के तौर पर पेश किया जबकि वह अपने चीनी माॅडल को किसी भी लोकतंत्र से ज्यादा बेहतर और प्रभावी होने का प्रचार करता रहा। चीन ने यह दिखाने का प्रयास किया कि उसका माॅडल किसी भी वैश्विक स्वास्थ्य एवं अन्य समस्या से निपटने में ज्यादा बेहतर है।

लेकिन चीन यह भूल रहा है कि दुनिया के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य के साथ आजादी भी चाहिये जबकि चीन इससे मीलों दुर है। चीन की सबसे बड़ी कमी यह है कि उसमें भारत और अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों की तरह लचीलेपन और खुलेपन की कमी है। इसके विपरित चीन न केवल अपनी जनता पर शिकंजा कसता जा रहा है बल्कि उनके जीवन की स्वतंत्रता और मानव अधिकारों को भी खतरें मे डाल रहा है। पिछलें कुछ समय से उईगरों के साथ ऐसा ही कुछ हो रहा है।

पहले तिब्बत, शिन्जियांग और अब हांगकांग में चीन के स्वायत्ता के वादे खोखले साबित हो रहे है। इसी खतरे को पहचान कर ताईवान ने चीन के ‘वन कन्ट्री टू सिस्टम’ के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। भविष्य के लिए चीन अपनी परमाणु क्षमता को भी अत्याधुनिक कर रहा है इससे चीन दुनिया में परमाणु शक्तियों के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा, तनाव और खतरें को बड़ा दिया है।

जैसा कि महामारी के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्रालय की एक रिपोर्ट के हवाले से ये दावे किये गये कि चीन ‘चीन ने अपने शिंजियांग में कम क्षमता वाले परमाणु परीक्षण किए है’ वही व्यापक परमाणु प्रतिबंध संधी (सीटीबीटी) के खिलाफ चीन के परमाणु परीक्षण को लेकर अमेरिका ने चिंता व्यक्ति कि है। चीन से खतरा इंटेलीजेंस और सायबर स्पेस का भी है। चीन तकनीक की दुनिया का मुख्य खिलाड़ी बनना चाहता है। चीन की टेक्नोलाॅजी कंपनी ख्वावे दुनिया की सबसे बड़े टेलिकाॅम नेटवर्क उपकरण बनाने वाली कंपनी, 5 जी नेटवर्क की तकनीक दुनिया के देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरें मे डाल सकती है।

चीन पर अभी लगातार सायबर हमले, हेकिंग, डेटा चुराने और जासूसी के आरोप लग रहे है। हाल ही में आस्टेªलिया, अमेरिका, भारत में चीन के सायबर हमले बड़े है। चीन ने अपने रणनीतिक साथी रूस को भी नहीं छोड़ा। रूस ने भी चीन पर जासूसी के आरोप लगाये है। न केवल चीन ने सेंट्रल एशिया में रूस के प्रभाव को कम कर करने की कोशिश की बल्कि यहा अपना दखल भी बढ़ा दिया है। चीन अपनी सेना में आर्टिफिशल ईटेंलिजेंस के प्रयोग में भी महारथ हासिल करना चाहता है ताकि इसके जरिये हथियारों के प्रयोग से दूर बेठे ही भविष्य में युद्ध को नियंत्रित किया जा सके इससे युद्ध कि सटिकता को बनाने के साथ ही युद्ध क्षेत्र को भी सीमित रखा जा सकेगा।

साथ ही इससे वह न केवल निगरानी, ड्रोन एवं मिसाइलों को संचालित करेगा। बल्कि युद्ध की योजना बनाने वाला साफ्टवेयर भी बना रहा है। यह अत्याधुनिक तकनीक भविष्य में चीन की आक्रमकता को बढ़ा देगा। इसके अलावा चीन में एक डिजिटल युआन मुद्रा (ई-आरएमबी) लाना चाहता है। इससे वैश्विक बदलाव आ सकता है। चीन इसका इस्तेमाल भू-राजनैतिक फायदें एवं ‘बेल्ट एण्ड रोड़’ इनिशिएटिव प्रोजेक्ट में शामिल देशों में निवेश के लिए कर सकता है। के 150 से अधिक देशों को लोन दे चुका है इसमें ज्यादातर विकासशील और अफ्रिकी देश है।

चीन ने अमेरिकी कंसलटेंसी फर्म के अनुसार चीन 461 अरब डाॅलर दे चुका है। चीन कर्ज देने की आक्रामक रणनीति बेहद कमजोर और जोखिम वाले देशों पर आजमा रहा है। लेकिन यदि ये देश चीन का कर्ज नहीं उतार पाते है तो इन्हें अपनी जमीन खोनी पड़ सकती है। जैसा कि श्रीलंका का हमब्नटोटा पोर्ट और पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट पर चीन के अधिकार चीन के अधिकार में है। महामारी के दौरान देखा जा सकता है कि चीन ने पूर्वी चीन सागर, दक्षिणी चीन सागर से लेकर दक्षिण एशियाई महा़द्वीप में भारत के गलवान घाटी तक चीन के आक्रामक रवैये के खतरे को देखा जा सकता है।

अतः एक जैसी सोच रखने वाले दुनिया के देशों को एक साथ मिलकर चीन का मुकाबला करना होगा। इसमें ‘क्वाड’ (क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डाॅयलाॅग) देशों को एक साथ आना होगा और इसे ‘क्वाड$’ देशों के रूप में इसे बढ़ाना होगा। साथ ही दक्षिणी चीन सागर और दक्षिणी चीन सागर देशों को साथ लाना चाहिये। ताकि चीन के आक्रामक और विस्वारवादी नीति का मुकाबला किया जा सके।

– डाॅ वीरेन्द्र चावरे
अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार, उज्जैन

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