राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग ने केंद्र और राज्य सरकारों में तैनात ग्रुप डी में आने वाले सफाई कर्मचारियों को नियमित करने और न्यूनतम वेतन तय करने की मांग की है। आयोग ने सरकार को पत्र लिखकर 1970 में बने एक कानून का हवाला भी दिया है। साथ ही आयोग ने मैनुअल स्कैवेंजिंग के चलते लगातार हो रही मौतों के आंकड़े को कम करने के लिए सभी जगह अंडरग्राउंड ड्रैनेज सिस्टम बनाने की सिफारिश की है।
बताया जा रहा है कि देश के केंद्रीय और राज्य सरकारों में पिछले 15 सालों से कार्यरत ग्रुप डी में आने वाले सफाई कर्मियों को स्थाई नौकरी देने की बजाय ठेकेदारों के जरिए काम कराया जाता है। एक कर्मचारी के अनुसार 1970 के संविदा श्रम विनियमन एवं उन्मूलन अधिनियम में स्पष्ट है कि ग्रुप डी के तहत आने वाले कार्यों को ठेकेदारी प्रथा के जरिए नहीं कराया जा सकता है।
आयोग का कहना है कि केंद्र, राज्य सरकारों एवं सरकारी संस्थानों को सफाई कर्मियों के सामाजिक और आर्थिक उत्थान को देखते हुए उन्हें संविदा पर रखने की बजाए रेगुलर बेसिस पर रखा जाए। सरकार के आंकड़ों के अनुसार पायलेट प्रोजेक्ट के तहत 44 जिलों में मैला ढोने वालों की संख्या तकरबीन 21 हजार और सफाई कर्मियों की संख्या तकरीबन 32 लाख है।
आयोग कर रहा देशभर के सफाई कर्मियों को रेगुलर करने की मांग

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