April 24, 2026

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आधी रात को निकली बाबा महाकाल की सवारी हुआ हरि हर मिलन

हीना तिवारी,उज्जैन: उज्जैन में कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी (वैकुंठ चतुर्दशी) पर देर रात को बाबा महाकाल की सवारी निकली। महाकालेश्वर मंदिर से चांदी की पालकी में सवार होकर बाबा महाकाल गोपाल मंदिर में भगवान द्वारकाधीश से मिलने पहुँचे। इस सवारी को हरी हर मिलन कहा जाता है जिसे देखने बड़ी संख्या में भक्त पहुँचते हैं।

बाबा महाकाल की सवारी रात 11 बजे महाकाल मंदिर के सभा मंडप से चांदी की पालकी में रवाना हुई। मन्दिर के मुख्य द्वार पर बाबा को पुलिस द्वारा गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। प्रमुख मार्गों से होते ही सवारी गोपाल मंदिर पहुँची जहाँ पूजन अभिषेक के बाद देर रात को सवारी पुनः महाकाल मंदिर पहुँची।

प्रतिवर्ष वैकुंठ चतुर्दशी पर महाकालेश्वर मंदिर से आधी रात को भगवान महाकाल की सवारी निकाली जाती हैं। महाकाल मंदिर के पुजारी आशीष पुजारी बताते हैं कि हरिहर के समीप विराजते हैं यहां सत्ता एक दूसरे को सौंपने के लिए दोनों का पूजन किया जाता है उन्हें विशेष भोग लगाया जाता है जहां भगवान श्री महाकालेश्वर वध श्री द्वारकाधीश का पूजन किया जाता है दोनों ही भगवानों को दूध दही घी शक्कर शहद पंचामृत अभिषेक पूजन किया जाता है इसके बाद भगवान महाकाल का पूजन विष्णु जी की प्रिय तुलसी की माला से किया जाता है वही भगवान विष्णु को शिव के प्रिय बिल्व पत्र की माला अर्पित की जाती है तुलसी की माला भगवान विष्णु को स्पर्श कराकर भगवान शिव को धारण कराई जाती है इसी तरह भगवान शिव को बेलपत्र की माला स्पर्श कर भगवान विष्णु को पहनाई जाती है इस तरह दोनों की प्रिय मालाओं को एक दूसरे को पढ़ा कर सृष्टि की सत्ता का स्थानांतरण होता है 2 देवताओं की दुर्लभ मिलन को देख नहीं भक्त साल भर प्रतीक्षा करते हैं और रविवार को बड़ी संख्या में भक्तों का हुजूम उमड़ पड़ा और लोगों ने यह दुर्लभ मिलन देखा और दर्शन लाभ लिए।

पौराणिक मान्यता के अनुसार वैकुंठ चतुर्दशी पर भगवान भोलेनाथ सृष्टि का कार्यभार भगवान विष्णु को सौंपकर कैलाश की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। प्राचीन नगरी उज्जयिनी यानी उज्जैन में इस पर्व को इसी मान्यता के अनुसार मनाया जाता है। इस अवसर पर भगवान भोलेनाथ महाकाल की सुंदर यात्रा गोपाल मंदिर पंहुचती है। पालकी से भगवान भोलेनाथ उतर कर श्री हरि को तुलसी भेंट करते हैं और श्री हरि उन्हें बदले में बिल्वपत्र देते हैं। इस सुंदर प्रसंग को हरि हर मिलन के नाम से जाना जाता है।

दूसरे शब्दों में इस दिन वैकुंठ चतुर्दशी पर हरिहर मिलन सवारी निकाली जाती है। जो अलग-अलग स्थानों, शहरों के विभिन्न मार्गों से होते हुए श्री महाकालेश्वर मंदिर पर पहुंचती है। वैकुंठ चतुर्दशी पर भक्तजनों का तांता लग जाता है।

ठाठ-बाठ से भगवान शिव पालकी में सवार होकर आतिशबाजियों के बीच भगवान भगवान विष्णु जी के अवतार श्रीकृष्ण से मिलने पहुंचते हैं।

कार्तिक शुक्ल पक्ष की मध्यव्यापिनी चतुर्दशी वैकुंठ चतुर्दशी पर भगवन शिवजी श्रीहरि से खुद मिलने जाते हैं। माना जाता है कि भगवान शिव चार महीने के लिए सृष्टि का भार भगवान विष्णु को सौंप कर हिमालय पर्वत पर चले जाएंगे।

प्रति वैकुंठ चतुर्दशी पर हरिहर मिलन होता है। भगवान शिव व विष्णु जी मिलते हैं एवं जो सत्ता भगवान शिव के पास है, वह विष्णु भगवान को इसी दिन सौंपते हैं। इस परंपरा को देखने के लिए मंदिरों में वैकुंठ चतुर्दशी पर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ जुटती है।

देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु पाताल लोक में राजा बलि के यहां विश्राम करने जाते हैं, इसीलिए इन दिनों में शुभ कार्य नहीं होते। उस समय सत्ता शिव के पास होती है और वैकुंठ चतुर्दशी के दिन भगवान शिव यह सत्ता विष्णु को सौंप कर कैलाश पर्वत पर तपस्या के लिए लौट जाते हैं। जब सत्ता भगवान विष्णु जी के पास आती है तो संसार के कार्य शुरू हो जाते हैं। इसी दिन को वैकुंठ चतुर्दशी या हरि-हर मिलन कहा जाता हैं।

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