शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में विदिशा की पहचान बन चुकी बांसकुली की मां श्री महाकाली की भव्य झांकी इस वर्ष अपने 79वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। यह आयोजन केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि दशकों पुरानी अटूट श्रद्धा और जनसहयोग की जीवित मिसाल है। शहर की इस प्रथम झांकी की शुरुआत साल 1946 में हुई थी, जब पहली बार मिट्टी से बनी करीब 3 फीट ऊंची मां महाकाली की प्रतिमा को पालकी में विराजमान कर बांसकुली क्षेत्र में स्थापित किया गया था।
👑 सवा सात दशक पुरानी परंपरा: 17 फीट की भव्य मूर्ति के साथ जीवंत है मूल स्वरूप, चांदी के आभूषण चढ़ाने की है खास मान्यता
महाकाली उत्सव समिति बांसकुली के संरक्षक नितिन सरवैया बताते हैं कि उनके पूर्वजों द्वारा शुरू की गई यह परंपरा आज भी पूरी भव्यता के साथ निभाई जा रही है। इस वर्ष भी 17 फीट की विशाल प्रतिमा के साथ-साथ मूल स्वरूप वाली 3 फीट की महाकाली की स्थापना की गई है। इस झांकी से जुड़ी एक खास मान्यता यह है कि दशकों पूर्व एक भक्त की मनोकामना पूरी होने पर उसने मां को चांदी के आभूषण अर्पित किए थे, जिसके बाद से माता को चांदी के गहने चढ़ाने की परंपरा लगातार चली आ रही है।
🎨 मूर्तिकार बदले लेकिन नहीं बदला मां का ‘सौम्य स्वरूप’: कोलकाता के कलाकार तराश रहे हैं वही पुराना भाव
इस झांकी की सबसे बड़ी विशेषता इसका अलौकिक और सौम्य स्वरूप है। साल 2012 से कोलकाता के प्रसिद्ध मूर्तिकार राजू बंगाली इस प्रतिमा का निर्माण कर रहे हैं, लेकिन 1946 से लेकर आज तक मां महाकाली के चेहरे का मूल भाव और सौम्यता वैसी ही बनी हुई है। शनिवार को माधवगंज से पालकी, मशालों की रोशनी और पारंपरिक बैंड-बाजों के साथ उल्लासपूर्ण माहौल में झांकी बांसकुली के लिए प्रस्थान कर चुकी है, जहां दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है।

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