इंदौर : देशभर में अत्यधिक चर्चित रहे इंदौर के बहुचर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड के मामले में अब एक नया और दिलचस्प कानूनी विवाद सामने आया है। मृतक राजा और मुख्य आरोपी सोनम की शादी के दौरान आयोजित हुई पार्टी और विवाह समारोह का केटरिंग का पूरा भुगतान अब तक नहीं चुकाया गया है। यही मुख्य वजह है कि केटरिंग व्यवसाई की तरफ से कानूनी नोटिस भेजकर बकाया राशि की मांग की गई है।
📜 केटरिंग वाले ने एडवोकेट के जरिए भेजा बकाया भुगतान का नोटिस
केटरिंग व्यवसाई हितेश उर्फ जिम्मी रोहित की ओर से उनके अधिवक्ता जयंत दुबे के माध्यम से भेजे गए इस आधिकारिक कानूनी नोटिस में कहा गया है कि गत 10 और 11 फरवरी 2025 को हुए उक्त भव्य विवाह समारोह में उनके द्वारा केटरिंग का पूरा कार्य किया गया था।
इस व्यवस्था का करीब 2 लाख 82 हजार रुपये का बकाया भुगतान आज दिनांक तक नहीं किया गया है। व्यवसाई का कहना है कि बार-बार अनुरोध करने और पैसे मांगने के बावजूद परिजनों द्वारा भुगतान नहीं किया जा रहा है। यदि यह बकाया भुगतान जल्द नहीं किया जाता है, तो केटरिंग व्यवसाई की तरफ से इस संबंध में माननीय न्यायालय में विधिवत परिवाद (Complaint) प्रस्तुत किया जाएगा। गौरतलब है कि इस हाई-प्रोफाइल मर्डर केस में राजा की हत्या के आरोप में सोनम रघुवंशी इस समय जेल में बंद है।
💔 मेघालय में हनीमून के दौरान रची गई थी हत्या की खौफनाक साजिश
इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि देखें तो मुख्य आरोपी सोनम पर यह गंभीर आरोप है कि उसने मई 2025 में मेघालय में हनीमून के दौरान अपने पति राजा रघुवंशी की निर्मम हत्या की पूरी साजिश रची थी।
जांच में यह बात सामने आई थी कि उसने कथित तौर पर अपने प्रेमी राज कुशवाह और उसके अन्य साथियों की मदद से इस सनसनीखेज वारदात को अंजाम दिया था। इस बहुचर्चित हत्याकांड की मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी ने देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश का पालन करते हुए शिलांग की ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण (सरेंडर) कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका को खारिज करते हुए उसे तीन सप्ताह के भीतर हर हाल में आत्मसमर्पण करने का स्पष्ट निर्देश दिया था। न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की विशेष पीठ ने मेघालय सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए अपने फैसले में कहा था कि मुकदमे के इस संवेदनशील चरण में सोनम किसी भी स्थिति में जमानत की हकदार नहीं है।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: टाइपिंग की छोटी त्रुटियां जमानत का आधार नहीं
शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि गिरफ्तारी मेमो (Arrest Memo) में यदि किसी प्रकार की कोई टाइपिंग संबंधी या मामूली त्रुटियां थीं, तो उन्हें आरोपी की जमानत का मुख्य आधार नहीं बनाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि यह मुकदमा अब अपने एक बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक चरण में पहुँच चुका है, और ऐसे समय में मुख्य आरोपी का जमानत पर बाहर रहना पूरी न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि अदालत ने उसकी राहत की मांग को पूरी तरह ठुकरा दिया था।

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