October 1, 2026

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Samrat Vikramaditya University News: वाग्देवी भवन में कला विमर्श का आयोजन, प्रोफेसर श्रीकृष्ण जोशी और डॉ. रामचंद्र ठाकुर हुए सम्मानित

समग्र कला मनीषी थे पद्मश्री डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर- प्रो जोशी

डॉ वाकणकर ने कला दृष्टि का उपयोग पुरातत्व के क्षेत्र में वैज्ञानिक सटीकता के साथ किया – प्रो शर्मा

कला विमर्श के अंतर्गत हुआ पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर की चित्रकला दृष्टि पर मंथन, कला मनीषी प्रो श्रीकृष्ण जोशी एवं डॉ रामचंद्र ठाकुर का हुआ सारस्वत सम्मान

सम्राट् विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन की हिंदी अध्ययनशाला एवं ललित कला अध्ययनशाला द्वारा संस्कार भारती मालवा प्रांत, उज्जैन के सहयोग से कला विमर्श के अंतर्गत पद्मश्री डॉक्टर विष्णु श्रीधर वाकणकर की चित्रकला दृष्टि पर अभिकेंद्रित राष्ट्रीय परिसंवाद एवं व्याख्यान का आयोजन वाग्देवी भवन में किया गया। कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि प्रख्यात चित्रकार एवं कला मनीषी प्रोफेसर श्रीकृष्ण जोशी थे। अध्यक्षता अश्विनी शोध संस्थान महिदपुर के निदेशक डॉ रामचंद्र ठाकुर ने की। कार्यक्रम में कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा, प्रो जगदीश चंद्र शर्मा डॉ रमण सोलंकी आदि ने विषय के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर कला, संस्कृति और इतिहास के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए वरिष्ठ चित्रकार डॉ श्रीकृष्ण जोशी एवं मुद्राशास्त्री डॉ रामचंद्र ठाकुर को अंग वस्त्र, श्रीफल, साहित्य एवं मौक्तिक माल अर्पित कर उनका सारस्वत सम्मान किया गया।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रो श्रीकृष्ण जोशी ने कहा कि डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर समग्र कला मनीषी थे। उन्होंने अनेक शिष्यों को तैयार किया। डॉ वाकणकर के जीवन के दृष्टांतो को सुनाते हुए प्रो जोशी ने कहा उनकी पुरातत्व और कला दृष्टि सदैव प्रेरणादायी रहेगी।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ रामचंद्र ठाकुर ने कहा कि विष्णु श्रीधर वाकणकर विभिन्न शैलियों के चित्रकारों को उज्जैन लेकर आए। उसी के आधार पर कई पीढ़ियों ने प्रेरणा ग्रहण की। उज्जैन में चित्रांकन की दो शैलियाँ- शास्त्रीय और लोक शैली मिलती हैं। हमें वाकणकर जी के आदर्शों को अपनाना चाहिए और नई पीढ़ी को सिखाना चाहिए।

प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के जीवन और उनके महान योगदान पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. वाकणकर ने भीमबेटका के प्रागैतिहासिक शैलचित्रों की खोज की, जिन्हें यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी गई। वे मूलतः एक चित्रकार थे। उन्होंने अपनी कलात्मक दृष्टि का उपयोग पुरातत्व के क्षेत्र में वैज्ञानिक सटीकता के साथ किया। उनके पास मालवा और अन्य क्षेत्रों में ऐतिहासिक स्थलों को पहचानने की अद्भुत क्षमता थी। जहाँ भी वे जाते थे, वहां के पुरातात्विक अवशेषों का सूक्ष्म अध्ययन करते थे। उन्होंने न केवल पुरातात्विक खोजें कीं, बल्कि पारंपरिक चित्रकला शैलियों को संरक्षित करने और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुँचाने का भी कार्य किया।

डॉ. जगदीशचंद्र शर्मा ने अपने उद्बोधन में बताया कि वाकणकर जी का दृष्टिकोण प्राचीन और अर्वाचीन दोनों ही प्रकार का था। उन्होंने अपने उत्खनन, सर्वेक्षण को छोटी- छोटी पुस्तकों के रूप में छपवाया जिसका उपयोग हम उन ऐतिहासिक स्थलों और वास्तुओं को समझने के लिए कर सकते हैं। उन्होंने पुरा संपदा को सहजने का कार्य किया जो अतुलनीय है।

डॉ रमण सोलंकी ने अपने वक्तव्य में बताया कि वाकणकर जी की चित्रकला दृष्टि पुरातत्व और विज्ञान साथ लेकर चलती है। उन्होंने पुरातत्व के जो साक्ष्य खोजे हैं उनसे हमारी प्राचीन सभ्यता का पता लगता है।

प्रारम्भ में अतिथियों ने पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की। स्वागत संस्कार भारती की अध्यक्ष श्रीमती माया मालवेंद्र बधेका, डॉ राकेश ढंड, डॉ शेखर मेदमवार, श्री लक्ष्मीनारायण सिंहरोड़िया, डॉ महिमा मरमट आदि ने किया। ध्येय गीत की प्रस्तुति कुलदीप दुबे ने की।

कार्यक्रम का संचालन संस्कार भारती चित्रकला विधा संयोजक तिलकराज सिंह सोलंकी और आभार प्रदर्शन महामंत्री दुर्गाशंकर सूर्यवंशी ने किया।

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