मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में दीपावली का त्योहार हो या कोई अन्य शुभ व मांगलिक अवसर, आमतौर पर लोग अपने घरों में साफ-सफाई के साथ रंग-रोगन और भव्य सजावट कराते हैं। लेकिन आलोट क्षेत्र के कछालिया गांव में वर्षों से चली आ रही एक अनूठी और अद्भुत परंपरा के चलते घरों पर रंग-रोगन बिल्कुल नहीं किया जाता।
गांव में चाहे नया मकान बने या पुराना हो, किसी भी घर की दीवारों पर चूना या पेंट नहीं लगाया जाता। ग्रामीण इस आस्था और परंपरा को गांव में स्थापित काल भैरव (कालेश्वर भगवान) मंदिर की धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा हुआ बताते हैं।
🏡 300 से अधिक मकान और 1200 की आबादी; फिर भी दीवारों पर नहीं चढ़ता रंग
गांव का भूगोल और पूर्वजों की परंपरा:
- गांव की स्थिति: आलोट-जावरा मार्ग पर देहरी फंटे से करीब दो किलोमीटर अंदर बसे कछालिया गांव में वर्तमान में 300 से अधिक कच्चे-पक्के मकान बने हुए हैं।
- अनोखा सन्नाटा: लगभग 1200 की आबादी वाले इस गांव में दीपावली का पावन त्योहार बेहद नजदीक आ चुका है, लेकिन गांव के किसी भी घर में रंग-रोगन या पोताई की कोई तैयारी नहीं दिखती।
- पूर्वजों की देन: ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से बिना रुके निरंतर चली आ रही है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी आज भी पूरा गांव पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ इसका पालन कर रहा है।

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