मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी अधिकारियों द्वारा जनता के गाढ़ी कमाई के पैसों का दुरुपयोग किए जाने के मामले में बेहद सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल ने अपने एक कड़े आदेश में वन विभाग के प्रिंसिपल चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट (PCCF) शुभ रंजन सेन को जमकर फटकार लगाई है। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा है कि देश और कानून से ऊपर कोई नहीं है तथा किसी भी अधिकारी को टैक्सपेयर के पैसों को पानी की तरह बहाने और बर्बाद करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
👷♂️ क्या है पूरा मामला? 2014 से अटकी थी वन सुरक्षा श्रमिकों की मजदूरी, कोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं हुआ भुगतान
यह पूरा कानूनी विवाद सतना जिले के अमरपाटन और रामनगर क्षेत्र का है, जहाँ वर्ष 2014 से 2016 के बीच 25 वन सुरक्षा गार्डों को अंशकालिक (Part-time) आधार पर नियुक्त किया गया था। सेवाएँ लेने के बावजूद इन श्रमिकों को उनकी मजदूरी का पूरा भुगतान नहीं किया गया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद श्रम आयुक्त और बाद में 22 दिसंबर 2022 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी इन कर्मचारियों को उनका रुका हुआ वेतन देने का स्पष्ट आदेश दिया था। इसके बावजूद वन विभाग ने आदेश का पालन करने के बजाय वर्ष 2023 में एक रिव्यू पिटीशन दायर कर दी, जिसमें सरकारी वकीलों की फौज होने के बावजूद एक महंगे निजी अधिवक्ता (Private Advocate) को कोर्ट में खड़ा कर दिया गया।
🏛️ हाईकोर्ट का तीखा सवाल—सरकारी वकील रहते क्यों हायर किया प्राइवेट एडवोकेट? 18 सितंबर को होना होगा व्यक्तिगत रूप से पेश
बीते 21 अगस्त 2026 को इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस विवेक अग्रवाल ने प्राइवेट एडवोकेट की उपस्थिति पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए पूछा कि जब सरकार के पास वकीलों की पूरी फौज है, तो इस मामले में निजी अधिवक्ता को क्यों हायर किया गया? इसके साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया कि चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट शुभ रंजन सेन आगामी 18 सितंबर को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होकर यह स्पष्ट करें कि किस अधिकारी के निर्देश पर निजी वकील को हायर किया गया था और अब तक गरीब मजदूरों को उनका न्यूनतम वेतन क्यों नहीं दिया गया?
👮♂️ एक अन्य मामले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया—सब-इंस्पेक्टर की वार्षिक वेतनवृद्धि रोकने का अधिकार एसपी को प्राप्त
इसी क्रम में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एक अन्य खंडपीठ ने पुलिस विभाग से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। जस्टिस हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने सब-इंस्पेक्टर की वार्षिक वेतन वृद्धि रोके जाने के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता (जो अब डीएसपी के पद पर हैं और 2006 में छतरपुर में सब-इंस्पेक्टर पद पर थे) ने विभागीय जांच के तहत एसपी द्वारा सजा दिए जाने को चुनौती दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस नियमों के तहत सब-इंस्पेक्टर स्तर के कर्मचारी को दंडित करने और उनकी वेतन वृद्धि रोकने का अधिकार संबंधित पुलिस अधीक्षक (SP) के पास सुरक्षित होता है।

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