छिंदवाड़ा: दिवाली रोशनी और खुशियों का पावन त्योहार है, लेकिन इस बार की दिवाली छिंदवाड़ा की आम जनता के लिए खुशियां कम और आर्थिक चिंता ज्यादा लेकर आई है। इसका सबसे बड़ा मुख्य कारण बाजार में बेतहाशा बढ़ी महंगाई है। स्थानीय निवासियों और गृहिणियों का कहना है कि भगवान की पूजा मूर्ति से लेकर रसोई के राशन और बच्चों के आतिशबाजी तक सब कुछ महंगा हो गया है। ऐसे में दिवाली का पावन पर्व आम और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए काफी भारी पड़ रहा है।
🗿 लक्ष्मी जी की मूर्ति से लेकर रसोई का बजट बिगड़ा; ₹30 से ₹40 महंगा हुआ चावल
गृहिणी और समाजसेवी का बयान:
- दोगुना हुआ खर्च: समाजसेवी व गृहिणी श्वेता पाटनी ने बताया कि पहले आम मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए दिवाली की संपूर्ण तैयारी आराम से ₹10,000 तक में हो जाती थी, लेकिन इस बार यही खर्च लगभग दोगुना होकर ₹20,000 के पार पहुँच रहा है।
- मूर्तियों और राशन के बढ़े दाम: पूजा के लिए माता लक्ष्मी जी की जो छोटी मूर्ति पहले ₹20 तक में आसानी से मिल जाती थी, अब बाजार में उसकी शुरुआती कीमत ही ₹50 से हो रही है। इसके साथ ही किचन का बजट भी पूरी तरह चरमरा गया है, जहाँ चावल के रेट में अचानक ₹30 से ₹40 प्रति किलो की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
🎆 आतिशबाजी के दाम दोगुने होने से बच्चों में मायूसी; ₹80 वाला पटाखा पैकेट ₹150 में
पटाखा व्यापारियों का अनुभव:
- दोगुनी हुई कीमतें: पटाखे का कारोबार करने वाले चंद्रभान सोनी ने बताया कि आतिशबाजी के दामों में इस बार भारी इजाफा हुआ है। पिछले साल जो रस्सी बम का पैकेट ₹80 में मिलता था, वह इस साल बाजार में लगभग ₹150 में बिक रहा है।
- ग्राहकों की कमी: आतिशबाजी के दाम लगभग दोगुने हो जाने से दुकानों पर ग्राहक कम आ रहे हैं और बच्चों के चेहरों पर मायूसी है। जो व्यक्ति पहले ₹2,000 में बच्चों के लिए कई किस्म की आतिशबाजी खरीद लेता था, उसे अब उतने ही सामान के लिए सीधा दोगुना पैसा चुकाना पड़ रहा है।
💸 महीने की शुरुआत में दिवाली आने और महंगाई बढ़ने से घर चलाना हुआ मुश्किल
मध्यम वर्ग की व्यावहारिक चुनौतियाँ:
- बजट का असंतुलन: समाजसेवी श्वेता पाटनी के अनुसार, मिडिल क्लास का व्यक्ति अपनी सीमित सैलरी को पूरे महीने की जरूरतों के हिसाब से प्लान करता है।
- पूरे महीने की तंगी: इस साल दिवाली महीने के शुरुआती दिनों में ही है और ऊपर से महंगाई भी दोगुनी हो गई है। ऐसे में दिवाली के त्यौहार में ही बड़ा हिस्सा खर्च हो जाने से बाकी बचे पूरे महीने का घरेलू खर्च चलाना आम नागरिकों के लिए बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण साबित होगा।

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