नईदिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आज सोमवार को अपना एक फैसला सुनाते हुए कहा कि दृष्टिहीन लोगों को न्यायिक सेवाओं में रोजगार के अवसर से वंचित नहीं रखा जा सकता है। कोर्ट ने मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा के एक नियम को खारिज करते हुए अपना फैसला सुनाया है।
जस्टिस न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने पिछले साल 3 दिसंबर 2024 को कुछ राज्यों में न्यायिक सेवाओं में दृष्टिबाधित या दृष्टिहीन लोगों को आरक्षण न दिए जाने को लेकर स्वत: संज्ञान वाले एक मामले समेत 6 याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
जस्टिस महादेवन ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि न्यायिक सेवा में भर्ती के दौरान दिव्यांग लोगों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए। सरकार को समावेशी ढांचा सुनिश्चित करने के लिए उनके लिए पॉजिटिव स्टेप्स लेने चाहिए। जस्टिस ने कहा,’ चाहे वह कट ऑफ के जरिए हो या प्रक्रियात्मक बाधाओं के कारण। किसी भी तरह के ऐसे अप्रत्यक्ष भेदभाव में हस्तक्षेप किया जाना चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप दिव्यांगजन को अवसर से वंचित रखा जाता हो ताकि मौलिक समानता बरकरार रखी जा सके।
फैसले में कहा गया कि किसी भी उम्मीदवार को केवल उसके दिव्यांग होने के कारण अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश सेवा परीक्षा नियम 1994 के उन कुछ नियमों को भी रद्द कर दिया, जिसके तहत दृष्टिबाधित और अल्प दृष्टि वाले उम्मीदवारों को न्यायिक सेवा में प्रवेश से रोका गया था। ये याचिकाएं मध्य प्रदेश नियमावली के नियम 6A और सात की वैधता से संबंधित थीं। फैसले में कहा गया है कि चयन प्रक्रिया में भाग लेने वाले PWD (दिव्यांग) उम्मीदवार फैसले के आलोक में न्यायिक सेवा चयन के लिए विचार किए जाने के हकदार हैं और अगर वे पात्र हैं तो उन्हें खाली पदों पर नियुक्त किया जा सकता है।

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