November 6, 2026

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Vulture Count News Updates: क्या है बांधवगढ़ में गिद्धों के बढ़ने की असली वजह? पढ़िए क्षेत्र संचालक की पूरी बात

उमरिया जिले का प्रसिद्ध बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व यूं तो मुख्य रूप से बाघों के लिए अपनी वैश्विक पहचान रखता है, यहाँ के घने और मनोरम जंगल पर्यटकों को अनायास ही अपनी ओर आकर्षित करते हैं; लेकिन इसके साथ ही यहाँ का प्राकृतिक इको-सिस्टम गिद्धों के लिए भी एक बेहद सुरक्षित और अनुकूल आवास साबित हुआ है। गिद्धों को प्रकृति का ‘सफाई कर्मी’ कहा जाता है। देश भर में जहाँ एक समय में गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई थी, वहीं बांधवगढ़ के जंगलों में ये पक्षी न सिर्फ पूरी तरह सुरक्षित हैं, बल्कि तेजी से अपना कुनबा भी बढ़ा रहे हैं। विलुप्त होते गिद्धों के लिहाज से यह बेहद सुखद खबर है, क्योंकि अब बांधवगढ़ उनके लिए एक महफूज ठिकाना बन चुका है।

📈 लगातार बढ़ रहा है गिद्धों का कुनबा; 2021 के 172 से बढ़कर 2026 में पहुंचे 388

गणना के आंकड़े और प्रबंधन की सफलता:

  • क्षेत्र संचालक का बयान: बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक अनुपम सहाय बताते हैं कि हाल ही में हुई आधिकारिक गिद्ध गणना के आंकड़े इस बात की पुख्ता तस्दीक करते हैं कि पार्क का इको-सिस्टम कितना स्वस्थ है।
  • संख्या में उछाल: साल 2021 की शुरुआत में यहाँ कुल 172 गिद्ध (159 बड़े और 13 छोटे) थे। वनकर्मियों की कड़ी मेहनत और सटीक प्रबंधन के कारण 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 300 तक पहुँच गया।
  • ताजा आंकड़े (मई 2026): 24 मई 2026 की ताजा गणना में यह रिकॉर्ड आंकड़ा 388 तक पहुँच गया है, जिसमें 358 वयस्क और 30 छोटे गिद्ध शामिल हैं। नए चूजों और छोटे गिद्धों की निरंतर मौजूदगी यह साबित करती है कि बांधवगढ़ का वातावरण उनके प्रजनन के लिए कितना उत्तम है।
🔍 बांधवगढ़ में मौजूद हैं गिद्धों की 7 प्रमुख प्रजातियां; सबका है अपना विशेष महत्व

विभिन्न प्रजातियों का विवरण: ग्रीष्म और शरद ऋतु की गणना के दौरान बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में कुल 7 प्रजातियों के गिद्ध दर्ज किए गए हैं:

  • इंडियन वल्चर (लॉन्ग-बिल्ड/देशी गिद्ध): यह पार्क में सबसे ज्यादा दिखने वाला गिद्ध है। ऊंची चट्टानों पर झुंड में रहने वाले इस पक्षी की चोंच इतनी मजबूत होती है कि यह मरे हुए वन्यजीवों के सख्त चमड़े को भी आसानी से फाड़कर जंगल को साफ करता है।
  • इजिप्शियन वल्चर (सफेद गिद्ध): आकार में थोड़ा छोटा और बेहद चतुर होता है। बड़े गिद्धों के खाने के बाद बची हुई हड्डियों और मांस के अंशों को अपनी पतली चोंच से खाकर यह ‘माइक्रो-CLEANING’ करता है।
  • रेड-हेडेड वल्चर (किंग वल्चर): लाल सिर वाला यह गिद्ध अकेला रहना पसंद करता है। इसकी दृष्टि और सूंघने की क्षमता इतनी तेज होती है कि यह मरे हुए जानवर तक सबसे पहले पहुँचता है।
  • व्हाइट-रम्प्ड वल्चर: देश में दुर्लभ हो चुकी यह प्रजाति भी यहाँ ऊंचे पेड़ों (जैसे साल या साजा) पर घोंसला बनाती नजर आती है।
  • सिनेरियस वल्चर: दुनिया के सबसे भारी और विशाल उड़ने वाले पक्षियों में से एक, जिसका गहरा भूरा-काला रंग इसे अलग पहचान देता है।
  • हिमालयन ग्रिफॉन और यूरेशियन ग्रिफॉन: हिमालय की ऊंचाइयों और विदेशी क्षेत्रों से सर्दियों के मौसम में भोजन व सुरक्षित ठिकाने की तलाश में बांधवगढ़ पहुँचने वाले विशालकाय प्रवासी मेहमान हैं।
⛰️ गिद्धों को क्यों पसंद आया बांधवगढ़? विंध्य पर्वतमाला और सुरक्षित माहौल का कमाल

अनुकूल परिस्थितियां और संरक्षण:

  • भौगोलिक बनावट: विंध्य पर्वतमाला की ऊंची और खड़ी चट्टानें इन्हें घोंसले बनाने के लिए सुरक्षित स्थान देती हैं। गहरी घाटियों से दिन के वक्त उठने वाली गर्म हवाएं इन भारी-भरकम पक्षियों को बिना पंख फड़फड़ाए घंटों आसमान में उड़ने में मदद करती हैं।
  • डाइक्लोफेनाक पर रोक: मवेशियों के इलाज में उपयोग होने वाली खतरनाक दवा ‘डाइक्लोफेनाक’ पर शासन द्वारा रोक लगाने से इन्हें सुरक्षित भोजन मिलने लगा है, क्योंकि इस दवा के असर वाले मवेशियों का मांस खाने से गिद्धों की मौत हो रही थी।
  • प्रशासनिक प्रयास: टाइगर रिजर्व प्रबंधन द्वारा गर्मियों में जंगलों की आग से इनके घोंसलों को सुरक्षित रखने और इंसानी दखलंदाजी को रोकने के किए गए कड़े उपायों ने इन्हें एक आदर्श घर दिया है। स्वस्थ इको-सिस्टम और प्रचुर भोजन के चलते आज बांधवगढ़ गिद्ध संरक्षण का एक राष्ट्रीय मॉडल बन चुका है।
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