सितंबर महीने के आखिरी सप्ताह से ही सनातन परंपरा के महत्वपूर्ण ‘पितृ पक्ष’ की शुरुआत होने जा रही है। इस 16 दिवसीय अवधि में पितरों (पूर्वजों) की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए विशेष पूजा-पाठ, तर्पण और पिंडदान किया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान हमारे पूर्वज अपने वंशजों के घर आगमन करते हैं, इसलिए श्रद्धापूर्वक उनका आवाहन कर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है।
📅 कब से शुरू हो रहा है पितृ पक्ष: जानिए 16 श्राद्धों की सटीक तिथियां
ज्योतिष आचार्य पंडित सुशील शुक्ला शास्त्री के अनुसार, इस वर्ष पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर (शनिवार) से हो रही है।
कुल 16 श्राद्ध होते हैं, जिनमें 26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध संपन्न होगा और यह 10 अक्टूबर तक चलेगा। 26 सितंबर से 10 अक्टूबर के मध्य पड़ने वाली सभी तिथियां पूर्ण तिथियां हैं। जब कृष्ण पक्ष में तिथियां खंडित नहीं होती हैं, तो उसे शास्त्रों में अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।
तर्पण और पूजन की विधि:
जिनके पूर्वजों को शांत हुए 3 वर्ष या उससे अधिक समय हो चुका है, वे पितृ पक्ष में अपने घर पर पितरों को आदरपूर्वक आमंत्रित करें। मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष में पूर्वज अपने घर आने के इच्छुक होते हैं। ऐसे में घर में एक पवित्र चबूतरा या वेदी बनाकर पितरों की स्थापना करें। श्राद्ध पक्ष के प्रत्येक दिन प्रात:काल स्नान के उपरांत जल और दूध से तर्पण करें। तर्पण में काले तिल, चावल और जौ अर्पित करें। इसके बाद घर में बने सात्विक भोजन को दोने व पत्तल में रखकर जल से आचमन कराएं और संध्या समय दीपक प्रज्वलित करें। इससे पितृ देव अत्यंत प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं।
🗓️ 27 सितंबर से प्रतिपदा का मुख्य श्राद्ध: 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या
26 सितंबर (शनिवार) से शुरू हो रहे पितृ पक्ष में 27 सितंबर (रविवार) को आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि का मुख्य श्राद्ध होगा।
16 दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान का समापन 10 अक्टूबर (शनिवार) को ‘सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या’ के साथ होगा। इस दिन सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों के नाम से श्राद्ध और दान-पुण्य करने का विधान है।
🌸 पितृ पक्ष की ‘मातृ नवमी’ तिथि क्यों है विशेष: जानिए माताओं के पूजन का नियम
ज्योतिष आचार्य पंडित सुशील शुक्ला शास्त्री बताते हैं कि पितृ पक्ष की 16 तिथियों में नवमी तिथि का विशेष स्थान है।
यह तिथि केवल और केवल माताओं (दिवंगत माताओं, सासू मां, दादी, नानी) के श्राद्ध और तर्पण के लिए समर्पित होती है। इसे ‘मातृ नवमी’ कहा जाता है। इस दिन परिवार की दिवंगत माताओं का तर्पण, पूजन और उनके नाम से दान-पुण्य करना चाहिए, जिससे कुल में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
🕉️ मातृ-पितृ ऋण से पाएं संपूर्ण छुटकारा: गया जी और बद्रीनाथ में पिंडदान का महत्व
ज्योतिष आचार्य के अनुसार, जो व्यक्ति अपने माता-पिता को बैकुंठ धाम पहुंचाना चाहते हैं और जिनके माता-पिता के देवलोकगमन को 3 वर्ष पूरे हो चुके हैं, वे शास्त्रोक्त विधि से पिंडदान कर सकते हैं।
- पितृ ऋण से मुक्ति: पिता की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए बिहार स्थित ‘गया जी’ जाकर विधि-विधान से पिंडदान करना चाहिए।
- मातृ ऋण से मुक्ति: माता जी के मोक्ष के लिए ‘बद्रीनाथ धाम’ (ब्रह्मकपाल) जाकर तर्पण और पिंडदान करने का विधान है।
शास्त्रों में उल्लेख है कि जो संतान अपने माता-पिता का अंतिम श्राद्ध गया जी और बद्रीनाथ में संपन्न कर देती है, उन्हें पितृ ऋण और मातृ ऋण से पूर्णतः मुक्ति मिल जाती है। इससे घर में सुख-शांति रहती है, वंश की उन्नति होती है और अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
✨ भरणी और मघा नक्षत्र का बन रहा है दुर्लभ योग: गया जी के समान मिलेगा पुण्य
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस बार 16 दिवसीय पितृ पक्ष के दौरान ‘मां भरणी’ पंचांग तिथि के साथ ‘भरणी नक्षत्र’ और ‘माघा श्राद्ध द्वादशी’ तिथि के साथ ‘मघा नक्षत्र’ जैसे बेहद पवित्र और दुर्लभ नक्षत्र योग बन रहे हैं।
धार्मिक मान्यता है कि इस विशेष नक्षत्र योग में घर पर किया गया श्राद्ध कर्म भी गया जी में किए गए पिंडदान के समान ही अनंत गुना पुण्य प्रदान करता है।

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