मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय द्वारा कृषि क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। विश्वविद्यालय प्रदेश के 26 अलग-अलग जिलों से श्रीअन्न (मोटे अनाज) की प्रमुख फसलों—जैसे ज्वार, बाजरा, कोदो, कुटकी, सावां, कंगनी और चीना—का जर्मप्लाज्म एकत्र करने जा रहा है। कृषि वैज्ञानिक इन सभी नमूनों का वैज्ञानिक परीक्षण कर ऐसे विशिष्ट गुणों की पहचान करेंगे, जिनके आधार पर भविष्य में स्थानीय और क्षेत्रीय जलवायु के अनुकूल अधिक उत्पादक और बेहतर किस्में विकसित की जा सकें। कुछ चुनिंदा जिलों से जर्मप्लाज्म का यह संग्रहण कार्य पहले ही आरंभ किया जा चुका है।
💰 राज्य सरकार से मिला 25 लाख रुपये का अनुदान, झाबुआ-आलीराजपुर पर रहेगा विशेष फोकस
इस महत्वकांक्षी अनुसंधान परियोजना को गति देने के लिए राज्य सरकार ने कृषि विश्वविद्यालय को 25 लाख रुपये का आर्थिक अनुदान प्रदान किया है। इस वित्तीय सहायता का उपयोग जर्मप्लाज्म के सुरक्षित संग्रहण, संरक्षण, प्रयोगशाला परीक्षण और अनुसंधान गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने में किया जाएगा। इसके तहत विभिन्न जिलों की मिट्टी के प्रकार, वर्षा के औसत, कृषि पद्धतियों और स्थानीय रूप से प्रचलित पारंपरिक किस्मों का विस्तृत अध्ययन होगा। विशेष रूप से झाबुआ और आलीराजपुर जैसे आदिवासी बहुल जिलों को प्राथमिकता दी जा रही है, जहाँ कम पानी और पथरीली जमीन पर भी किसान लंबे समय से पारंपरिक मोटे अनाजों की खेती करते आ रहे हैं।
🧬 कम पानी में पैदावार और पारंपरिक बीजों को आधुनिक अनुसंधान का आधार बनाना
वैज्ञानिकों का मुख्य उद्देश्य इन पारंपरिक बीजों की उन विशेषताओं को परखना है, जो उन्हें प्रतिकूल मौसम, कम जल उपलब्धता और कठिन परिस्थितियों में भी टिके रहने की क्षमता देती हैं। इन बेहतर आनुवंशिक गुणों को चिन्हित कर आगे के ब्रीडिंग प्रोग्राम में शामिल किया जाएगा ताकि नई उन्नत किस्में तैयार की जा सकें। इस प्रकार किसानों द्वारा सदियों से सहेजकर रखे गए पारंपरिक बीज अब आधुनिक कृषि अनुसंधान के लिए एक मजबूत आनुवंशिक संसाधन के रूप में कार्य करेंगे, जिससे प्रदेश के अन्नदाताओं को सीधा लाभ मिलेगा।

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