इंदौर: शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास एवं देवी अहिल्या विश्वविद्यालय द्वारा कंप्यूटर विज्ञान विभाग में राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का विषय “विकसित भारत में शिक्षित महिला की भूमिका ” था।
कार्यशाला में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव अतुल कोठारी ने कहा है कि महिलाओं के उत्थान में ही देश का उत्थान समाहित है। जब तक देश में महिलाओं का उत्थान नहीं हो जाता तब तक देश प्रगति की राह पर लक्ष्य के अनुरूप गति हासिल नहीं कर सकता है । इस कार्यशाला के समापन में प्रदेश की महिला में बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया ने कहा कि समाज में जाकर जड़ों तक पहुंचाने की आवश्यकता है। तभी हम किसी परिवर्तन का आधार तैयार कर सकेंगे।
कोठारी ने अपनी बात का प्रारंभ मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियों से किया, “हम क्या थे , क्या है, क्या होंगे – आओ विचारे सभी” । उन्होंने कहा कि आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक महिला सशक्तिकरण है । आदिकाल में लक्ष्मीबाई से लेकर उन्होंने आधुनिक काल की चंद्रयान की वैज्ञानिक महिलाओं की बात की और आधुनिकता का सही अर्थ बताया । आधुनिक काल के साथ-साथ महिलाओं को अपनी संस्कृति एवं संस्कार को संगठित रखना चाहिए । महिलाओं को मानसिक एवं शारीरिक रूप से विकसित होनी चाहिए अंत में उन्होंने कहा कि “महिलाओं का उद्धार तो देश का उद्धार”।
इस कार्यक्रम का संचालन पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला की विभागाध्यक्ष डॉ सोनाली नरगुंदे के द्वारा किया गया। विभाग अध्यक्ष द्वारा स्मृति चिन्ह न्यास के राष्ट्रीय सचिव मुख्य अतिथि डॉ अतुल कोठारी , देवी अहिल्या विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ रेणु जैन, डॉ शोभा ताई, डॉ वैशाली वायंगर को दिया गया। शोभा ताई ने सभी अतिथियों का परिचय कराया ।
कुलगुरु डा रेणु जैन ने कहा कि विकसित भारत में शिक्षित महिलाओं की भूमिका बहुत बड़ी है। देश की राष्ट्रपति डॉक्टर द्रौपदी मुर्मू ने महिला सशक्तिकरण की भूमिका से परिचय कराया और साथ ही साथ मां देवी अहिल्या एवं मां सीता का भी स्मरण कराया।आभार प्रदर्शन डॉ बबिता कलकिया ने किया ।
कार्यशाला के दूसरे सत्र में सागर विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. नीलिमा गुप्ता ने शिक्षित महिलाओं की अहमियत और देश के विकास में उनके योगदान की बात की। उन्होंने कहा समाज का निर्माण महिलाओं के बिना संभव नहीं है। सौराष्ट्र विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि लगभग 82% लड़कियां उत्तीर्ण होती हैं मगर इनमे से सिर्फ 2–3% ही नेतृत्व के पद तक पहुंच पाती हैं। आज के युग में भी ऐसी कई जगह मौजूद हैं। जहां लड़कियों को शिक्षित सिर्फ अच्छे वर के लिए किया जाता है। डॉ. गुप्ता ने कहा कि शिक्षित बच्चियों के लिए भी आगे रास्ता निकालने के लिए मंच का निर्माण महत्वपूर्ण है, साथ ही पुरुषो को भी महिलाओं को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
कार्यशाला में डॉ. नीलम बरी ने बताया कि कैसे औरतें बहुत सारे कार्य करती हैं। महिलाओं को प्रेरित करने के उद्देश्य से डॉ. दवे ने अपने एक विद्यार्थी की सफलता की कहानी सबके साथ सांझा की। उन्होंने सभी को स्वदेशी अपनाने की सलाह दी।
उज्जैन की डॉ. प्रेरणा मानना ने महिलाओं की आर्थिक स्थिति के बारे में बात की। उन्होंने आर्थिक रूप से एक महिला के आत्मनिर्भर होने के सकारात्मक प्रभावों को बताया।
जबलपुर से आई संस्कृत अध्यापक डॉ. शुभम जैन ने भारतीय नारी के गुण बताए और महिला स्वावलंबन के साथ आत्मनिर्भरता के बारे में बताया।
देवगिरी प्रांत से आई डॉ. विशाला शर्मा और लखनऊ से डॉ. संगीता ने श्रोतागणों को सशक्त महिला की गुणवत्ता के बारे में बताया। राष्ट्रीय कार्यशाला में जुड़ने के लिए प्रेरित कर सबसे पहले अपने घर से शुरुआत करने के लिए कहा। कार्यक्रम का समापन एकादशी चेतवान ने आभार प्रदर्शन के साथ किया।
कार्यक्रम के अंतिम सत्र में सम्मेलन समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य समाज में स्त्री की भूमिका पर प्रकाश डालना था। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि प्रदेश की महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया थी। उन्होंने कहा कि मैंने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों को बहुत करीब से देखा है। इन आयोजनों से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है, और यह बेहद सार्थक होते हैं। हमें समाज में जाकर, उसकी जड़ों तक पहुंचने की आवश्यकता है, ताकि हम असली समस्याओं को समझ सकें। चाहे वह कृषि में परिवर्तन की बात हो या समाज के मूल ढांचे में सुधार की, हमें इन्हें गहराई से समझने और बदलने की जरूरत है।”
मुख्य वक्ता अतुल कोठरी ने स्वामी विवेकानंद के विचारों का संदर्भ देते हुए कहा कि राष्ट्र को गरुड़ पक्षी की तरह माना जा सकता है, जिसके दोनों पंख (पुरुष और स्त्री) समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। अगर दोनों पंख साथ नहीं उड़ेंगे, तो राष्ट्र का उत्थान संभव नहीं होगा। उन्होंने स्त्री शक्ति के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि स्त्री प्रेरक और चैतन्य शक्ति होती है, जो परिवार और देश के विकास की दिशा तय करती है।
राष्ट्रीय संयोजिका शोभा ताई पैठणकर ने सम्मेलन में शिक्षा और संस्कृति के माध्यम से स्त्रियों के उत्थान की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने शिक्षा को समाज का सबसे महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि चरित्रवान व्यक्ति से ही समाज और देश की उन्नति संभव है। इसलिए, चरित्र निर्माण और संस्कारित शिक्षा पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। इस सम्मेलन में भी देश भर से शिक्षाविदों और महिलाओं की सहभागिता रही।
कार्यक्रम के समापन में पत्रकारिता विभागाध्यक्ष डॉ. सोनाली नरगुंदे ने सभी का आभार प्रकट किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. वैशाली वाईकर द्वारा किया गया।

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