इंसान को जन्म लेने के लिए नौ महीने का समय लगता है, पर अर्थशास्त्री, डॉक्टर, नेता और राजनीतिज्ञों पर यह नियम भारत में तो लागू नहीं होता। यह सच है, क्या आपको यकीन नहीं होता? हो जाएगा विश्वास रखिए। अब ये लॉकडाउन के तीन महीने ही ले लो मेरे मोहल्ले में नए नवेले अर्थशास्त्री, डॉक्टर और नेता का जन्म हुआ।
लॉकडाउन के दौरान तो इनसे मुलाकात नहीं हो सकी, क्योंकि मैं भी घर में ही कैद थी। हालाँकि उम्मीद थी कि इनसे मेरी मुलाकात जल्द ही होगी। आखिरकार वो दिन भी आ ही गया। लॉकडाउन में राहत मिलते ही इनसे पाला पड़ गया। मुलाकात का सारा हाल मैं आपको बताऊँ, उससे पहले ये बता दूं कि बेवक्त जन्मे ऎसे महानुभावों से मेरी इसी तरह मुलाकात अक्सर बस और ट्रेन के सफर में होती रही है। आपकी भी होती होगी चाय की दुकान, पान की दुकान पर… है ना!
तो मेरी सबसे पहले मुलाकात अर्थशास्त्री महोदय से किराने की दुकान पर हुई। इनका जन्म भले ही लॉकडाउन में हुआ हो, पर यकीन मानिये इन्हें भारत की अर्थव्यवस्था की जानकारी आज़ादी से लेकर अब तक की है। मैंने दुकानदार से तेल के दाम पूछे और दाम सुनते ही मैंने कहा- ‘इतनी जल्दी भाव कैसे बढ़ गए।’ तभी अर्थशास्त्री महोदय बीच में ही बोल पड़े-‘अरे बहनजी! अब इसमें इनकी क्या गलती लॉकडाउन से सारी अर्थव्यवस्था ही चरमरा गई है। नोटबंदी के बाद इस लॉक डाउन से सभी की कमर टूट गई है। क्या अमीर क्या गरीब सभी के एक जैसे हालात हैं। सबसे ज्यादा मार तो मध्यमवर्गीय पर पड़ी है।’
उनकी बातें मेरी समझ थोड़ी आ रहीं थी थोड़ी नहीं। वे ज्ञानी अर्थशास्त्री जो ठहरे। इतने में उन्होंने कहा-‘ अभी सरकार ने 20 लाख करोड़ का पैकेज दिया है, देखते हैं इससे कितना फायदा होगा।’ उनकी बात सुनते मेरे अंदर इतने दिनों से जो सवाल उठ रहा था मैने पूछ ही लिया। सोचा ये अर्थशास्त्री हैं, ये जवाब नहीं देंगे तो कौन देगा. मैने पूछा- ‘महोदय ये 20 लाख करोड़ में कितने शून्य होते हैं?’ मेरा इतना पूछना था कि अर्थशास्त्री महोदय मेरी तरफ ऐसे देखने लगे जैसे मैंने उन्हें कोरोना संक्रमित व्यक्ति का मास्क सुंघा दिया हो। उस दिन के बाद से वो सोशल डिस्टेंस का पालन मेरे साथ सख्ती से कर रहे हैं।
अब दूसरी मुलाकात मेरी डॉक्टर साहब से सब्जी की दुकान पर हो गई। इनका जन्म भी लॉकडाउन के दौरान ही हुआ है. वैसे डॉक्टर बनने में 5-6 साल लगते हों, पर इन साहब का डॉक्टरी ज्ञान जन्मजात है। हां तो सब्जी की दुकान पर मैं और वो, अरे वही डॉक्टर साहब सब्जियां खरीदने के इरादे से आए थे। अच्छी-अच्छी सब्जियां मुझसे पहले चुनते हुए वे कहने लगे- ‘आजकल सब्जियां लेने में भी डर लगता है। ना जाने किस सब्जी में कोरोना बैठा हो।’
उन्होंने फ्री के धनिये से ज्यादा मुझे फ्री की नसीहतें दे डालीं। तभी मैंने मौका देखते हुए पूछ लिया कि डॉक्टर साहब आप मेरी एक सहायता कर देंगे? आप मुझे हाइड्रॉक्सिक्लोरोक्विन की दवा की स्पेलिंग लिख देंगे क्या? सुना है काफी फायदेमंद है। इसकी विदेशों में काफी डिमांड है। स्पेलिंग लिखने के नाम से डॉक्टर साहब को तो साँप सूंघ गया। सुना है आजकल वे सिर्फ मास्क लगाकर घूमते हैं, किसी से कुछ नहीं कहते।
तीसरी मुलाकात मेरी मोहल्ले के अभी-अभी जन्मे नेताजी से आटा चक्की की दुकान पर हो गई। मुलाकात काफी गर्मजोशी के साथ हुई। नेता जी कहने लगे हमारे नेता ने लॉकडाउन में खूब काम किया। गरीबों को खाना खिलाया। मोहल्ले को सैनिटाइज करवाया। वे नहीं होते तो अब तक सबको कोरोना हो चुका होता। अब नेताजी की बात सुनते मुझसे रहा नहीं गया। मैने कहा- ‘नेताजी आप सत्ता पक्ष के हैं या विपक्षी दल के मुझे नहीं पता। अगर आप सत्ता पक्ष के हैं तो बताएं कि देश में मजदूरों का इतना पलायन क्यों हुआ? लॉकडाउन-4 के बाद भी हालत क्यों नहीं सुधरे? जमाती इतने दिन छिपके कैसे रहे? पीएम फंड का पैसा कहां और कितना खर्च किया गया? और अगर आप विपक्षी दल के हैं, तो लॉकडाउन में आपके सर्वोच्च नेता नज़र क्यों नहीं आए?’
मुझे नहीं पता मेरी बात सुनकर नेताजी को क्या हो गया, पर ऐसा लगा जैसे मैंने चक्की में गेहूँ नहीं, बल्कि नेताजी को ही डाल दिया हो। उसके बाद से फिर मुझे नेताजी चक्की तो क्या कहीं नज़र नहीं आए। वैसे सुना है, ऐसे नेताजी, अर्थशास्त्री और डॉक्टर हर गली मोहल्ले में जन्म ले चुके हैं। इसलिए थोड़ा सम्भलकर कहीं आपको न मिल जाएं। मिल भी जाएं तो भला इसी में है कि सोशल डिस्टेंस का सख्ती से पालन अवश्य करें।
✒️ प्रो.वन्दना जोशी

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