कुदरत ने हर चीज़ को किसी खास मकसद के लिये बनाया और हम मतलबी अपने मतलब के लिए उसे खर्च करते रहे। भौतिक सुख सुविधाओं के पीछे भागते-भागते कुदरत के कारखाने में हमने कब तबाही मचानी शुरू कर दी, हमें पता ही नहीं चला। अब आलम ये है कि हवा तो ताज़ी है, पर लेने में कोताही है।
अजब बात है जिस देश की सभ्यता और संस्कृति ने पेड़ों को औलाद और नदियों को माँ के समान समझने की हिदायत दी, उसे भूलते-भूलते हम उस मुकाम तक पहुंच गए, जहां चंद कदमों के फासले पर अब मौत पसरी है। देश ही नहीं, दुनिया जिंदगी के लिए दुआएं मांग रही है। पर गलती तो हमारी ही है, जब कुदरत हमें हमारी गुस्ताखियों के लिए आगाह कर रही थी, तब हम उसे नजरअंदाज किए जा रहे थे। स्वाइन फ्लू, बर्ड फ्लू, मुंबई में बाढ़, दिल्ली में प्रदूषण, दक्षिण में बाढ़, कोरोना महामारी और अब बंगाल, ओडिसा में अम्फान तूफान। ये चेतावनी नहीं तो और क्या हैं?
आखिर गलती कब और कहां से हुई? इसका पता लगाने के लिए तो हमें हमारी संस्कृति की ओर ही मुखातिब होना पड़ेगा। भारतीय परम्परा के अनुसार इस कुदरत को ही इस जहाँ का बादशाह/भगवान/ईश्वर/गॉड या जो भी नाम हो पुकारा गया। आग, हवा, पानी, आसमान और ज़मीन को भगवान मानकर पूजा जाता था और इसी को सर्वशक्तिमान कहा गया। आंवला, तुलसी, वट और न जाने कितने दरख्तों को आँगन में बोने की नसीहत दी गई। सब कुछ अच्छे से चल रहा था, तांबे के लोटे से तुलसी को सींचना आदत बन गई थी।
फिर इंसान ने गाड़ी-मोटर बनाई, कारखाने लगाए। सच मानो कुदरत को इससे रत्ती भर भी शिकायत नहीं थी, क्योंकि उसने इंसान को ऐसी नियामतें इसलिए ही तो बक्शी थी कि वो इस जहाँ में सुख से रह सके। पर ये सुख ही सारी फसाद की जड़ निकला। थोड़ा और… थोड़ा और… पा लेने की चाह में इंसान ने मोटर पर मोटर, कारखाने पर कारखाने और आबादी पर आबादी बढ़ाना शुरू कर दिया।
कब खेत खत्म हो इमारतों के जंगल बन गए, कब नदियां नालों जैसी हो गईं, कब पेड़ कटकर मैदान और फिर डामर की सड़कों के जाल फैल गए पता ही नहीं चला। कब तांबे के लोटे की जगह पाइप आ गया, कब तुलसी का पौधा शो प्लांट बन गया और जल चढ़ाना पानी देना बन गया, हम समझ ही नहीं पाए। मान्यताओं को अंधविश्वास का नाम दे दिया गया, कुदरत के पर्व वैसाखी, मकर सक्रांति, वट सावित्री, गंगा दशहरा, बसन्त पंचमी की जगह न्यू ईयर और इंटरनेशनल डेज ने ले ली।
इन सबके बीच सबसे बुरा बर्ताव उन बेजुबानों के साथ हुआ, जिनका इंसान की ही तरह इस कुदरत पर बराबर का हक था। पेड़ों पर बांधे जाने वाले सकुरे, छत पर बिखरा दाना, चीटियों का आटा, गाय और कुत्ते की रोटी, कौवे का ग्रास सिर्फ परम्परा बन कर रह गए, इसका इल्म इंसान को नहीं रहा। अब कुदरत जो कहर बरपा रही है, उसकी वजह इंसान के तौर-तरीके ही हैं। हमारी गुस्ताखियां माफी के काबिल नहीं हैं। अब जरूरत है तो बस इस बात की कि गुस्ताखियों पर पर्दा न डालकर उसे सुधारा जाए। हमें अब समझ जाना चाहिए कि ये कुदरत इस कायनात को बना सकती है तो इसे तबाह भी कर सकती है।
✒️ प्रो.वन्दना जोशी

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