उज्जैन। शैव महोत्सव के तहत उज्जैन में चल रहे व्याख्यानों के क्रम में दूसरे दिन महाकालेश्वर मन्दिर प्रवचन हॉल में सत्रों का उद्बोधन मुख्यतः शिव तत्व की शास्त्रों में व्याख्या पर केन्द्रित रहा। देशभर से आए हुए विद्वान वक्ताओं ने अपने विषयों पर विभिन्न वेदों, पुराणों, स्मृतियों और अन्य प्राचीन ग्रंथों के आधार पर भारतीय संस्कृति में शिव के महत्व व व्याप्त आचार-विचारों पर अपने उद्भट व्याख्या सुधिजनों के समक्ष प्रस्तुत की। इस दौरान सिंहस्थ केन्द्रीय समिति के अध्यक्ष माखनसिंह चौहान भी उपस्थित रहे।
प्रथम सत्र में कर्मकाण्ड और पूजा विधान विषय पर सारस्वत अतिथि के रूप में प्रो विरूपाक्ष जड्डीपाल उपस्थित थे। मुख्य वक्ता प्रो किशोर मिश्र रहे। अध्यक्षता डॉ सदाशिव कुमार द्विवेदी ने की। डॉ रमण मिश्र विषय प्रवर्तक थे। डॉ रमण मिश्र ने अपने उद्बोधन में कहा कि व्यक्ति को महत्व देने से पूर्व शास्त्रों में लोक को महत्व दिया गया है। भारतीय परम्परा में व्यापक दृष्टिकोण अपनाया जाकर लम्बे विचार उपरान्त पूजा पद्धति और अन्य कर्मों को अपनाया गया है। ऋषि वचन प्रमाण्य है, क्योंकि ऋषि लोक से विचार करता था। लोक परीक्षण के बाद ही भावों की स्थापना की गई है। अधिष्ठ अपूर्व स्थापना के लिए पूजा पद्धति कार्य करती है। उन्होंने आत्मा की अमरता, ईश्वर के अस्तित्व पर भी अपने विस्तृत विचार प्रकट किए।
उनके अलावा डॉ सदाशिव कुमार द्विवेदी, प्रो विरूपाक्ष जड्डीपाल तथा अतिथि के रूप में उपस्थित महामण्डलेश्वर श्री पुण्यानन्दगिरीजी ने भी शिव तत्व, काल तत्व, प्राचीन भारतीय ग्रंथों में शिव तथा अन्य तत्वों की संबद्धता पर अपने गहन विचार विस्तृत रूप से श्रोताओं के समक्ष व्यक्त किए।
शैव महोत्सव में विद्वानों ने बताई शिव तत्व की विस्तृत महत्ता

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